सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : कैंसर के इलाज में अब केवल यह जानना पर्याप्त नहीं माना जा रहा कि शरीर के किस हिस्से में ट्यूमर है। वैज्ञानिक और चिकित्सक ट्यूमर में मौजूद आनुवंशिक बदलावों को समझने पर भी जोर दे रहे हैं। नेक्स्ट-जनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) इसी दिशा में महत्वपूर्ण तकनीक बनकर सामने आई है। इससे कैंसर कोशिकाओं में मौजूद कई आनुवंशिक बदलावों की एक साथ जांच की जा सकती है। NGS के जरिए डॉक्टर यह पता लगाने की कोशिश कर सकते हैं कि ट्यूमर में कौन-से जीन बदलाव मौजूद हैं और उनमें से कौन-सा बदलाव किसी विशेष दवा या लक्षित उपचार से जुड़ा हो सकता है। इससे कुछ मरीजों के लिए उपचार का चुनाव अधिक व्यक्तिगत यानी प्रिसिजन मेडिसिन के आधार पर किया जा सकता है। हालांकि, हर मरीज में NGS से ऐसा बदलाव मिलना जरूरी नहीं है जिससे सीधे किसी लक्षित दवा का विकल्प उपलब्ध हो।
भारत में भी कैंसर उपचार में जीन आधारित जांच का इस्तेमाल बढ़ रहा है। 2026 में उत्तर भारत के एक कैंसर केंद्र के 180 मरीजों के अध्ययन में NGS के जरिए कई आनुवंशिक बदलावों की पहचान की गई। अध्ययन में फेफड़ों के कैंसर के मरीजों की संख्या सबसे अधिक थी और EGFR, MET, ALK जैसे उपचार से जुड़े बदलाव भी सामने आए। शोधकर्ताओं ने इसे भारत में व्यक्तिगत उपचार रणनीतियों के लिए उपयोगी बताया है| टाटा मेमोरियल सेंटर ने भी 2026 में NGS पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम में बताया कि यह तकनीक अब कैंसर चिकित्सा में व्यावहारिक इस्तेमाल का हिस्सा बन रही है। इसमें ट्यूमर की जांच के साथ-साथ लिक्विड बायोप्सी, सर्कुलेटिंग ट्यूमर डीएनए और उपचार के बाद बची कैंसर कोशिकाओं की निगरानी जैसे क्षेत्रों पर भी काम हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार NGS कैंसर का इलाज खुद नहीं है, बल्कि यह डॉक्टरों को बीमारी की आणविक प्रकृति समझने और उपलब्ध उपचार विकल्पों में से उपयुक्त विकल्प चुनने में मदद करने वाली जांच है। इसकी जरूरत और उपयोग कैंसर के प्रकार, बीमारी की अवस्था और मरीज की स्थिति के आधार पर तय किया जाता है।
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