सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : पैरालिसिस या न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कारण बोलने की क्षमता खो चुके लोगों के लिए ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) नई उम्मीद बन रहा है। यह तकनीक सीधे दिमाग से मिलने वाले संकेतों को कंप्यूटर द्वारा समझे जाने वाले शब्दों में बदलने का काम करती है। हालिया शोध में एक ही ब्रेन इम्प्लांट की मदद से बोलने और हाथ-चेहरे के इशारों को एक साथ समझने का प्रदर्शन किया गया है।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
सर्जरी के जरिए मस्तिष्क के उस हिस्से के ऊपर इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जहां बोलने और शरीर की गतिविधियों से जुड़े संकेत पैदा होते हैं। जब व्यक्ति बोलने की कोशिश करता है, भले ही उसकी आवाज बाहर न निकल पाए, इम्प्लांट उन न्यूरल संकेतों को रिकॉर्ड करता है। इसके बाद मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इन संकेतों के पैटर्न को पहचानकर उन्हें शब्दों, टेक्स्ट या डिजिटल आवाज में बदलती है।
नए शोध में शोधकर्ताओं ने 253 इलेक्ट्रोड वाले हाई-डेंसिटी इम्प्लांट से सेंसरिमोटर कॉर्टेक्स की गतिविधि रिकॉर्ड की। सिस्टम ने बोलने के साथ-साथ सिर हिलाने, हाथ हिलाने या अन्य इशारों के संकेतों को भी समझकर स्क्रीन पर टेक्स्ट और डिजिटल अवतार की गतिविधियों में बदला।
2026 के एक अन्य अध्ययन में एक पैरालाइज्ड व्यक्ति ने घर पर लगभग दो साल तक BCI का इस्तेमाल किया और 1.96 मिलियन से अधिक शब्दों के बराबर संचार किया। हालांकि ऐसी तकनीक अभी शुरुआती और शोध चरण में है तथा इसमें सर्जरी, व्यक्तिगत प्रशिक्षण और सुरक्षा जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
वायरलेस तकनीक इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है। जून 2026 में मिशिगन यूनिवर्सिटी में एक वायरलेस BCI का पहली बार इंसान में प्रत्यारोपण किया गया, जिसका उद्देश्य बोलने में कठिनाई वाले मरीजों के लिए लंबे समय तक उपयोगी संचार प्रणाली विकसित करना है।
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