स्मार्टवॉच और फिटनेस बैंड के बाद अब दिमाग की सेहत पर नजर रखने का दावा करने वाला एक नया वियरेबल डिवाइस चर्चा में है। इसका नाम TEMPLE है, जिसे जोमैटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल ने विकसित किया है। माथे के पास पहने जाने वाले इस डिवाइस की कीमत 85 हजार रुपये रखी गई है। कंपनी का दावा है कि यह दिमाग में रक्त प्रवाह और शरीर पर पड़ने वाले जैविक तनाव से जुड़े संकेतों को ट्रैक कर सकता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों ने इसके वैज्ञानिक आधार और सटीकता पर सवाल उठाए हैं।
क्या है TEMPLE और कैसे करता है काम?
यह छोटा डिवाइस माथे के कनपटी वाले हिस्से पर लगाया जाता है। इसमें ऑप्टिकल सेंसर लगे हैं, जो प्रकाश के माध्यम से त्वचा के नीचे रक्त प्रवाह और ऑक्सीजन से जुड़े बदलावों का पता लगाने का प्रयास करते हैं। इसका ब्रेनफ्लो फीचर दिमाग में रक्त संचार से संबंधित जानकारी देने का दावा करता है। इसके अलावा इसमें एंट्रॉपी स्कोर भी है, जो तनाव, नींद, व्यायाम और शरीर पर पड़ने वाले अन्य प्रभावों से जुड़े संकेतों को दर्शाने के लिए तैयार किया गया है।
डॉक्टरों ने उठाए वैज्ञानिक प्रमाणों पर सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि कनपटी पर सेंसर लगाकर प्राप्त संकेतों को पूरे मस्तिष्क के रक्त प्रवाह का सटीक माप मानना उचित नहीं है। इस हिस्से में त्वचा और सिर की सतही रक्त वाहिकाओं का भी प्रभाव पड़ सकता है। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला सहित कई विशेषज्ञों ने डिवाइस की कार्यप्रणाली, क्लिनिकल परीक्षण और स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाणों की उपलब्धता पर सवाल उठाए हैं।
क्या इससे बीमारी का पता लगाया जा सकता है?
फिलहाल TEMPLE को मेडिकल जांच करने वाले उपकरण के बजाय वेलनेस और रिसर्च डिवाइस के रूप में पेश किया गया है। यह अल्जाइमर, डिमेंशिया या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों का निदान करने के लिए प्रमाणित विकल्प नहीं है। दिमाग की जांच के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार EEG, MRI, CT एंजियोग्राफी और ट्रांसक्रेनियल डॉप्लर जैसी स्थापित तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।
दीपिंदर गोयल ने भी स्पष्ट किया है कि यह मेडिकल डिवाइस नहीं, बल्कि फिटनेस और वेलनेस उत्पाद है। कंपनी के अनुसार, इसके वैज्ञानिक अध्ययन और आगे के परीक्षण जारी हैं।
विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी वियरेबल डिवाइस के स्कोर को बीमारी का संकेत मानकर घबराना या उसके आधार पर इलाज शुरू करना उचित नहीं है। दिमाग की वास्तविक सेहत का आकलन चिकित्सकीय जांच और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तरीकों से ही किया जाना चाहिए।
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