आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : यूआईटी आरजीपीवी भोपाल परिसर में नवागत प्रवेश लेने वाले स्नातकों के लिये विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित दीक्षा आरम्भ कार्यक्रम के दौरान 14 सितंबर हिंदी दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया साथ ही एक सत्र में “जीवन मूल्य और संस्कार “विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।इस अवसर पर मुख्य वक्ता समाजसेवी हेमंत मुक्तिबोध एवं विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी शाशिरंजन अकेला थे,सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति सुनील कुमार ने की,
इस अवसर पर जीवन मूल्य एवं संस्कार विषय पर व्याख्यान देते हुए हेमंत मुक्तिबोध ने कहा कि मनुष्य अपने जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति के लिए अनेक चुनोतियों का सामना करता है, उसे परिस्थितियों का प्रतिकार करने का साहस व्यक्तित्व से मिलता है, व्यक्तित्व जितना प्रभावी होगा लक्ष्य की प्राप्ति उतनी आसान होगी । वस्तुतः नर से नारायण बनने की यात्रा व्यक्तित्व विकास है।
उन्होंने कहा कि व्यक्तित्व का विकास केवल शारिरिक विकास नही है अपितु भारतीय जीवन दृष्टि में शरीर,मन ,बुद्धि एवं आत्मा का विकास समग्र विकास है।जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अच्छी बातों को ग्रहण करना,कमियों को दूर करना एवं हीनता के भाव को समाप्त करने से व्यक्तित्व बनता है।भारतीय दर्शन में सोलह संस्कार संस्कृति और जीवन मूल्यों का हमे साक्षात्कार कराते हैं यही संस्कार हमे व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। परस्पर आत्मीयता, जीवन एवं स्त्री को देखने की दृष्टि, परंपराओं का सम्मान एवं संस्थाओं की प्रणाली के प्रति सकारात्मक भाव इत्यादि भारतीय जीवन मूल्य एवं उनका पालन समाज को सशक्त बनाते हैं।काम ,क्रोध, लोभ ,मोह एवं मत्सर मन के वायरस है इन्हें मिटाने के लिए अच्छे लोगो की संगत एवं जीवन में अच्छे विचारों का आना जरूरी है।
हिंदी दिवस पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी शाशिरंजन अकेला ने कहा कि जो पीढ़ी अपनी स्व भाषा,वेशभूषा, खानपान ,, स्वसंस्कृति, अपने ज्ञान एवं परंपरा तथा अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करती है उस समाज मे मूल्यों का कभी क्षरण नही होता ।हिंदी केवल भाषा नही अपितु मातृभाषा है ।हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति के मूल्यों की संवाहक है, यह भारतवर्ष की भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम बनी है।
अकेला ने कहा कि भाषा अपने आप मे पूरी सभ्यता एवं विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती है, आज भारत से संयुक्त राष्ट्र संघ तक हिंदी का परचम लहरा रहा है। विश्व के अनेक विश्वविद्यालय भारत की संस्कृति एवं जीवन मूल्य को समझने एवं आत्मसात करने के लिए हिंदी भाषा को आत्मसात कर रहे हैं।