आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मध्यप्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस ने मेघालय-मणिपुर जैसा कानून लाने का वादा किया है। कांग्रेस ने यह दांव 21 फीसदी आदिवासी वोटर को अपने पाले में लाने के लिए खेला है। मंडला की सभा में गुरुवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा, मप्र में हमारी सरकार आई तो 50% से अधिक आदिवासी आबादी वाले जिलों में छठवीं अनुसूची के प्रावधान लागू किए जाएंगे।
जानकारों का कहना है कि उनका यह वादा पूरा हुआ तो कम से कम छह आदिवासी बहुल जिलों को जल, जंगल, जमीन और विवाह-विरासत पर खुद का कानून बनाने व लागू करने का अधिकार आदिवासियों को मिल जाएगा। उन्हें रेत और गौड़ खनिज के पट्टे देने, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जरूरतों के लिए पानी के वितरण, जमीनों के वितरण, वन क्षेत्रों में खेती और चरवाही, स्थानीय रीति-रिवाजों से शादी-विवाह, तलाक और विरासत से जुड़े नियम-कानून बनाने व लागू करने का अधिकार होगा।
आइए समझते हैं कि कांग्रेस के इस वादे के पीछे की असल वजह क्या है? उसका जमीन पर परिणाम क्या हो सकता है?
2011 की जनगणना के मुताबिक मध्यप्रदेश की कुल आबादी में आदिवासियों की संख्या एक करोड़ 53 लाख 16 हजार 784 है। यह कुल आबादी का 21% से अधिक है। इसमें से एक करोड़ 42 लाख 76 हजार 874 लोग गांवों में रहते हैं। इस जनसंख्या में से 59 लाख 93 हजार 921 लोग भील, भिलाला, बारेला और पटेलिया समुदाय के हैं जो निमाड़-मालवा के जिलों में फैले हैं। उसके बाद गोंड जनजाति आती है, जिनकी संख्या 50 लाख 93 हजार 124 है। यह जनजाति महाकौशल के जिलों में सघनता से बसी हुई है।
प्रदेश के 89 विकासखंडों में संविधान की पांचवीं अनुसूची पहले से लागू है। पांचवीं अनुसूची वाले ये विकासखंड आलीराजपुर, अनूपपुर, बड़वानी, बालाघाट, बैतूल, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, धार, डिंडौरी, नर्मदापुरम, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, मंडला, रतलाम, सिवनी, शहडोल, श्योपुर, सीधी और उमरिया जिलों में आते हैं। ये इलाके कांग्रेस का गढ़ रहे हैं। भाजपा के आने के बाद इन क्षेत्रों में कांग्रेस का जनाधार कमजोर हुआ है। खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने पूरा जोर लगा दिया है।
इस बार स्वायत्त परिषदों का दांव खेल दिया गया है। यह एक ऐसा वादा है जो पूर्वोत्तर के चार राज्यों असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के अलावा कहीं लागू नहीं है। कानूनी मामलों के जानकारों का कहना है कि इस अनुसूची में संशोधन कर नए क्षेत्रों को शामिल कर लेना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। इसके लिए संसद में सामान्य बहुमत की जरूरत होगी, लेकिन छठवीं अनुसूची में मध्य प्रदेश के जिलों को शामिल करना पूरी तरह केंद्र सरकार के ही हाथ में होगा।
पहले समझिए यह पांचवीं अनुसूची क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन व नियंत्रण के बारे में व्यवस्था की गई है। इसके तहत सरकार किसी क्षेत्र को पांचवीं अनुसूची में शामिल कर सकती है। ऐसे राज्यों में एक जनजातीय सलाहकार परिषद होगी। यह अनुसूची राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों का संरक्षक बनाती है।
इसके तहत राज्यपाल एक अधिसूचना से यह कह सकता है कि कोई कानून या उसका कोई भाग अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा। राज्यपाल ऐसे क्षेत्र के लिए विनियम बना सकेगा। पांचवीं अनुसूची की यह व्यवस्था मध्य प्रदेश के अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान में भी लागू है। प्रियंका के वादे वाली 6वीं अनुसूची क्या है…
आदिवासी जिलों में क्षेत्रीय और जिला स्वायत्त परिषद का प्रावधान
संविधान के अनुच्छेद 244 (2) और 275(1) में 6वीं अनुसूची की व्यवस्था पूर्वोत्तर के चार राज्यों के लिए की गई है। इसका विषय असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी बहुल जिलों के प्रशासन को स्वायत्तता देना है। असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदलोई की अगुवाई में बनी समिति की सिफारिशों पर संविधान में इस अनुसूची को जगह दी गई।
इसके तहत आदिवासी बहुल जिलाें में क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद और स्वायत्त जिला परिषद बनाने का प्रावधान है।
राज्य के भीतर इन जिलों को विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता मिलती है। राज्यपाल को इन जिलों की सीमा घटाने-बढ़ाने का अधिकार है।
अगर किसी जिले में अलग-अलग जनजातियां हैं तो कई स्वायत्त परिषदें बनाई जा सकती हैं। ऐसी परिषद में 30 सदस्य हो सकते हैं जिनका कार्यकाल अधिकतम पांच साल का होगा। हालांकि, असम की बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्त परिषद में 40 से अधिक सदस्य हैं और उसे 39 विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि, इन परिषदों से पारित प्रस्ताव अंतिम नहीं होने हैं। इनको लागू होने के लिए राज्यपाल का अनुमोदन अनिवार्य है।