सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : एक देश, एक चुनाव: संभव है, लेकिन सवाल सिर्फ चुनावी तारीख का नहीं
आईटीडीसी न्यूज़ डिजिटल संस्करण – विशेष संपादकीय
1. चुनावी कैलेंडर से आगे की बहस
भारत में “एक देश, एक चुनाव” की बहस अब केवल राजनीतिक नारे या अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं रही है। संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक संसद की संयुक्त समिति के विचाराधीन हैं। समिति ने 2026 में भी विभिन्न राज्यों में विधायकों, विशेषज्ञों, नागरिक समाज, मीडिया और अन्य हितधारकों से इस प्रस्ताव के संवैधानिक और व्यावहारिक पहलुओं पर विचार-विमर्श किया है।
इसलिए अब मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी व्यवस्था भारत की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली, संघीय ढांचे और राजनीतिक वास्तविकताओं के भीतर लंबे समय तक टिकाऊ रह सकती है।
2. भारत के लिए यह पूरी तरह नई व्यवस्था नहीं
भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच तालमेल पहले भी रहा है। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में दोनों स्तरों के चुनाव व्यापक रूप से एक ही चुनावी चक्र में होते थे। बाद में कुछ विधानसभाओं और सरकारों के समय से पहले समाप्त होने तथा लोकसभा के कार्यकाल में बदलाव के कारण यह तालमेल टूटता गया।
इस इतिहास से स्पष्ट है कि एक साथ चुनाव कराना तकनीकी रूप से असंभव नहीं है। वास्तविक चुनौती एक बार चुनाव साथ कराने की नहीं, बल्कि आने वाले कई चुनावी चक्रों तक इस तालमेल को बनाए रखने की है।
3. संसदीय लोकतंत्र की वास्तविक चुनौती
भारत राष्ट्रपति प्रणाली वाला देश नहीं है। यहां सरकार का अस्तित्व सदन के विश्वास पर निर्भर करता है। बहुमत समाप्त हो सकता है, गठबंधन टूट सकता है, अविश्वास प्रस्ताव आ सकता है और किसी सदन को निर्धारित अवधि से पहले भंग करने की स्थिति पैदा हो सकती है।
इसलिए लोकतंत्र में सरकार का बीच कार्यकाल में गिरना अपने आप में कोई असंवैधानिक घटना नहीं है। यही कारण है कि “एक देश, एक चुनाव” की व्यवस्था बनाते समय ऐसे राजनीतिक संकटों के लिए स्पष्ट संवैधानिक समाधान जरूरी होगा।
4. सरकार गिरने पर क्या होगा?
यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। यदि किसी राज्य की सरकार पांच वर्षीय चुनावी चक्र के तीसरे वर्ष में गिर जाती है तो क्या होगा? क्या फिर उस राज्य में पूरा पांच वर्ष का नया कार्यकाल शुरू होगा या नई विधानसभा केवल साझा चुनाव तक ही काम करेगी?
रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने ऐसी परिस्थितियों के लिए व्यवस्था सुझाई थी, जिसमें समय से पहले गठित नई विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल अगले निर्धारित साझा चुनाव तक सीमित हो सकता है। उद्देश्य यह है कि एक सरकार के गिरने से पूरा चुनावी कैलेंडर फिर अलग-अलग चक्रों में न बंट जाए।
5. छोटे कार्यकाल का लोकतांत्रिक प्रश्न
लेकिन इस समाधान के साथ एक नया प्रश्न भी सामने आता है। यदि किसी विधानसभा का कार्यकाल साझा चुनाव से केवल एक या दो वर्ष पहले शुरू होता है तो उस सरकार को पूर्ण पांच वर्ष का अवसर नहीं मिलेगा।
क्या मतदाता पहले से यह जानते हुए चुनाव करेंगे कि उनके द्वारा चुनी गई सरकार का कार्यकाल सामान्य पांच वर्ष से छोटा हो सकता है? यदि चुनावी चक्र बचाने के लिए विधानसभा का कार्यकाल छोटा करना पड़े तो इसके लोकतांत्रिक और राजनीतिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा आवश्यक होगी।
6. समर्थकों के तर्क भी महत्वपूर्ण हैं
एक साथ चुनाव के पक्ष में सबसे प्रमुख तर्क प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर उपयोग का है। भारत में अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों में बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी, सुरक्षा बल और प्रशासनिक अधिकारी चुनावी ड्यूटी में लगाए जाते हैं।
लगातार चुनावों के कारण राजनीतिक दल भी लंबे समय तक चुनावी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। समर्थकों का तर्क है कि साझा चुनावी चक्र से चुनाव संबंधी खर्च, प्रशासनिक दबाव और बार-बार होने वाली चुनावी प्रक्रिया को कम किया जा सकता है। कोविंद समिति ने भी शासन में निरंतरता और संसाधनों के बेहतर उपयोग को अपने प्रमुख तर्कों में शामिल किया था।
7. लेकिन चुनाव केवल खर्च नहीं है
चुनाव लोकतंत्र की लागत भर नहीं हैं। वे सरकारों की जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए चुनावों की संख्या कम करने की प्रशासनिक उपयोगिता और मतदाताओं की राजनीतिक जवाबदेही—दोनों को साथ देखना होगा।
यदि किसी सरकार की लोकप्रियता या बहुमत कार्यकाल के बीच बदल जाता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था उस बदलाव को व्यक्त करने का रास्ता भी उपलब्ध कराती है। साझा चुनावी कैलेंडर बनाते समय इस राजनीतिक वास्तविकता की अनदेखी नहीं की जा सकती।
8. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों का अंतर
भारत की संघीय व्यवस्था में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे हमेशा एक जैसे नहीं होते। राष्ट्रीय चुनाव में विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, केंद्र की आर्थिक नीतियां और राष्ट्रीय नेतृत्व जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसके विपरीत राज्य चुनावों में सिंचाई, कृषि, स्थानीय रोजगार, क्षेत्रीय विकास, भाषा, कानून-व्यवस्था और राज्य सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
यदि दोनों चुनाव एक साथ होते हैं तो मतदाता इन दोनों स्तरों के मुद्दों को किस तरह अलग-अलग तौलते हैं, यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न रहेगा।
9. मतदाता को कम आंकना भी उचित नहीं
दूसरी ओर भारतीय मतदाता को इतना सरल मान लेना भी उचित नहीं होगा कि वह लोकसभा और विधानसभा के बीच अंतर नहीं समझता। भारत में अलग-अलग समय पर हुए चुनावों में मतदाताओं ने अलग-अलग स्तरों पर अलग राजनीतिक विकल्प चुने हैं।
इसलिए यह निष्कर्ष पहले से निकालना उचित नहीं होगा कि एक साथ चुनाव होने पर क्षेत्रीय मुद्दे समाप्त हो जाएंगे। लेकिन यह भी मान लेना कि चुनाव एक साथ होने से राष्ट्रीय और राज्य राजनीति के बीच कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, वास्तविकता को सरल बना देना होगा।
10. चुनावी मशीनरी की बड़ी चुनौती
एक साथ चुनाव के लिए बड़े पैमाने पर चुनावी संसाधनों की आवश्यकता होगी। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों, वीवीपैट, मतदानकर्मियों, प्रशिक्षण, परिवहन, सुरक्षित भंडारण और सुरक्षा बलों की पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी।
यह भी समझना जरूरी है कि “एक देश, एक चुनाव” का अर्थ अनिवार्य रूप से पूरे देश में एक ही दिन मतदान कराना नहीं है। साझा चुनावी चक्र के भीतर कई चरणों में मतदान कराया जा सकता है। संसदीय समिति के विचार-विमर्श में भी चुनावी चरण और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे विषय महत्वपूर्ण रहे हैं।
11. स्थानीय निकायों का प्रश्न
लोकसभा और विधानसभाओं के साथ पंचायत और नगर निकायों के चुनावों का प्रश्न व्यवस्था को और जटिल बनाता है। कोविंद समिति ने दूसरे चरण में पंचायतों और नगर निकायों के चुनावों को लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ समन्वित करने तथा उन्हें इनके 100 दिनों के भीतर कराने की सिफारिश की थी।
लेकिन स्थानीय निकायों का संबंध राज्यों की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था से भी है। इसलिए इस स्तर पर केंद्र और राज्यों के बीच स्पष्ट समन्वय आवश्यक होगा।
12. संघवाद को केंद्र में रखना होगा
भारत केवल एक राष्ट्रीय राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि राज्यों का संघ है। इसलिए चुनाव सुधार का कोई भी मॉडल ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें राज्यों की राजनीतिक विशिष्टताओं और संवैधानिक भूमिका को गौण माना जाए।
समिति की 2026 की चर्चाओं में भी संघवाद, समयपूर्व विघटन, शेष कार्यकाल और संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़े प्रश्न सामने आए हैं। इससे स्पष्ट है कि बहस केवल चुनाव की तारीख तय करने तक सीमित नहीं है।
13. असली चुनौती संक्रमण व्यवस्था की है
मान लीजिए किसी राज्य में साझा चुनाव के दो वर्ष बाद सरकार गिर जाती है। उसके बाद नई सरकार आती है। यदि उसका कार्यकाल केवल अगले साझा चुनाव तक सीमित किया जाता है तो राजनीतिक स्थिरता और शासन की निरंतरता के प्रश्न उठेंगे।
यदि उसे पूरा पांच वर्ष दिया जाता है तो साझा चुनावी चक्र फिर टूट सकता है।
यानी व्यवस्था के सामने दो उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाना होगा—सरकार को मिले जनादेश का सम्मान और साझा चुनावी चक्र को बनाए रखना।
14. असाधारण परिस्थितियों के लिए भी नियम जरूरी
किसी भी स्थायी चुनावी मॉडल को केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं बनाया जा सकता। इसमें त्रिशंकु सदन, गठबंधन टूटना, अविश्वास प्रस्ताव, सरकार बनने में असफलता, राष्ट्रपति शासन, प्राकृतिक आपदा या अन्य असाधारण परिस्थितियों में चुनाव टलने जैसे प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर होने चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात से तय होगी कि वह असामान्य राजनीतिक परिस्थितियों में भी संवैधानिक तरीके से काम करती रहे।
15. सुधार का उद्देश्य कैलेंडर से बड़ा होना चाहिए
एक साथ चुनावों का उद्देश्य केवल चुनावों की संख्या घटाना नहीं होना चाहिए। यदि व्यवस्था लागू होती है तो उसका उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता, नीति निरंतरता और चुनावी संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ-साथ लोकतांत्रिक जवाबदेही को सुरक्षित रखना भी होना चाहिए।
किसी भी सुधार की सफलता इस बात से तय होगी कि वह मतदाता के अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कितना मजबूत करता है।
16. व्यापक विचार-विमर्श जरूरी
इस विषय पर संसद की संयुक्त समिति द्वारा राज्यों और विभिन्न वर्गों के हितधारकों से विचार-विमर्श इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका प्रभाव केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं होगा। चुनाव आयोग, प्रशासन, सुरक्षा व्यवस्था, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, राजनीतिक दल और मतदाता—सभी इससे प्रभावित होंगे।
2026 में समिति ने गोवा सहित विभिन्न स्थानों पर विधायकों, नागरिक समाज, मीडिया और अन्य हितधारकों के साथ चर्चा की है। लखनऊ में भी शिक्षाविदों, पद्म पुरस्कार प्राप्त व्यक्तियों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से सुझाव लिए गए।
17. ‘हां या नहीं’ से आगे बढ़ने की जरूरत
“एक देश, एक चुनाव” को केवल समर्थन या विरोध के द्वंद्व में देखना इस विषय की संवैधानिक जटिलता को छोटा कर देगा। वास्तविक बहस इस बात पर होनी चाहिए कि यदि यह व्यवस्था बनाई जाती है तो उसमें कौन-कौन से सुरक्षा उपाय होंगे।
सरकार गिरने पर क्या होगा? विधानसभा का कार्यकाल कितना होगा? चुनाव टलने की स्थिति में क्या व्यवस्था होगी? राज्यों की भूमिका क्या होगी? स्थानीय निकायों को किस तरह जोड़ा जाएगा? इन सवालों के स्पष्ट उत्तर किसी भी अंतिम मॉडल की विश्वसनीयता के लिए जरूरी हैं।
18. निष्कर्ष: चुनाव एक साथ हों, लोकतांत्रिक आवाजें नहीं दबनी चाहिए
भारत में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साझा चक्र में लाना संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से संभव बनाया जा सकता है। लेकिन इसकी वास्तविक परीक्षा पहली बार एक साथ चुनाव कराने के दिन नहीं होगी।
असली परीक्षा तब होगी जब किसी सरकार का बहुमत बीच कार्यकाल में समाप्त होगा, गठबंधन टूटेगा, किसी विधानसभा को समय से पहले भंग करना पड़ेगा या किसी राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां राष्ट्रीय राजनीति से बिल्कुल अलग दिशा में होंगी।
लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनावी खर्च कम करना या प्रशासनिक सुविधा बढ़ाना नहीं है। इसका मूल उद्देश्य मतदाता की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति, निर्वाचित सरकार की जवाबदेही और राज्यों की संवैधानिक भूमिका को सुरक्षित रखना है।
“एक देश, एक चुनाव” का विचार संभव हो सकता है, लेकिन उसकी सफलता चुनावी तारीखों को एक करने से नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने से तय होगी जो राजनीतिक अस्थिरता के समय भी लोकतंत्र, संघवाद और मतदाता के अधिकारों को सुरक्षित रख सके। भारत को केवल एक साझा चुनावी कैलेंडर नहीं, बल्कि एक ऐसा संवैधानिक मॉडल चाहिए जो कई चुनावी चक्रों के बाद भी लोकतांत्रिक रूप से टिकाऊ साबित हो।
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