आईटीडीसी संपादकीय
मोहल्ले की कोई दुकान ऑनलाइन कुछ बेचे बिना भी खूब चल सकती है। सरकारी आंकड़ों को आधुनिक बनाने की नई पहल में यह साधारण बात याद रखनी होगी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर को वित्त वर्ष 2026–27 से 2030–31 तक के लिए विस्तार योजना को 4,371.10 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी। इसमें राज्यों की सांख्यिकीय व्यवस्था मजबूत करना और आठवीं आर्थिक गणना शामिल हैं। मोबाइल फोन, स्कैनर और ई-कॉमर्स के आंकड़ों को पारंपरिक सर्वेक्षणों के पूरक के तौर पर इस्तेमाल करने का प्रस्ताव भी है। इन्हें सर्वेक्षणों का विकल्प मान लेना गलत होगा।
जल्दी मिलने वाली जानकारी की उपयोगिता है। किसी जिले में कारोबार सुस्त पड़े तो उसकी पहचान के लिए राष्ट्रीय औसत का इंतजार क्यों हो? डिजिटल रिकॉर्ड बार-बार पूछे जाने वाले सवाल घटा सकते हैं और बदलाव का संकेत पहले दे सकते हैं। इसलिए नए तरीकों को संदेह भर के आधार पर खारिज करना उचित नहीं।
लेकिन तेजी से यह तय नहीं होता कि आंकड़ों में किसकी जिंदगी दिख रही है। नकद मजदूरी पाने वाला कामगार, घर से चलने वाला उद्यम या कम डिजिटल लेनदेन वाली दुकान भी गिनती में आने चाहिए। नई जानकारी को नीतियों का आधार बनाने से पहले प्रतिनिधिक सर्वेक्षणों से उसकी जांच हो और सीमाएं बताई जाएं।
योजना में शुरू से निजता का ध्यान रखने का वादा स्वागतयोग्य है। व्यक्तिगत रिकॉर्ड की सुरक्षा, उन तक पहुंच के स्पष्ट नियम और अनुमान निकालने की पद्धति का खुलासा इसे विश्वसनीय बनाएंगे। संयुक्त राष्ट्र के सांख्यिकीय सिद्धांत भी पेशेवर निर्णय, पारदर्शिता और गोपनीयता पर जोर देते हैं।
विस्तार की सफलता स्थानीय लोगों के लिए उपयोगी, भरोसेमंद आंकड़ों से मापी जाए। सही गिनती से फर्क पड़ सकता है कि प्रशिक्षण या कारोबारी सहायता की नीति उनकी जरूरत पहचानेगी भी या नहीं।