आईटीडीसी संपादकीय

अंताल्या में 9 नवंबर को शुरू होने वाले COP31 में सरकारों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे क्या करेंगी, धन कहां से आएगा और प्रगति कब जांची जाएगी। 20 नवंबर तक निर्धारित यह सम्मेलन जलवायु कूटनीति को जवाबदेह कार्रवाई से जोड़ने का अवसर है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2026 चुनौती स्पष्ट करती है। तापमान वृद्धि के अस्थायी रूप से 1.5°C से ऊपर जाने और बाद में वापस आने वाले, यथासंभव न्यूनतम अतिक्रमण के परिदृश्य में 2030 में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, 2025 के स्तर से 18 प्रतिशत कम होना चाहिए। राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के पूर्ण क्रियान्वयन से केवल 5–8 प्रतिशत कमी का अनुमान है। ये सशर्त आकलन हैं, सुनिश्चित परिणाम नहीं।

तेज कार्रवाई के पक्ष में मजबूत तर्क है कि देरी समस्या कठिन बनाती है। दूसरी ओर, विश्वसनीय वैकल्पिक ऊर्जा, सस्ते वित्त और श्रमिकों की सुरक्षा के बिना अचानक बदलाव अनुचित बोझ डाल सकता है। दोनों चिंताएं गंभीर हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को जीवनस्तर सुधारना है, लेकिन जलवायु जोखिम झेल रहे समुदाय अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते।

इसलिए COP31 को वित्तपोषित योजनाओं और स्पष्ट पड़ावों पर जोर देना चाहिए। सरकारें परियोजनाओं की समयसीमा, वित्तीय शर्तें, अनुमानित उत्सर्जन कटौती और स्वतंत्र सत्यापन की व्यवस्था सार्वजनिक करें। श्रमिकों तथा कमजोर परिवारों की सहायता इन योजनाओं का अभिन्न हिस्सा हो।

भारत के लिए उपयोगी दिशा होगी कि अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को भरोसेमंद बिजली, ऊर्जा-कुशल भवनों, बेहतर सार्वजनिक परिवहन और स्थानीय जवाबदेही वाली जलवायु अनुकूलन योजनाओं से जोड़ा जाए।

सफलता की कसौटी सरल हो: नागरिक देख सकें कि वादा क्या था, धन कितना मिला और काम कितना हुआ। अंताल्या को यह तुलना आसान बनानी चाहिए।

चित्र: एआई से बना संपादकीय चित्र; यह COP31 का वास्तविक फोटो नहीं है।
स्रोत: https://unfccc.int/cop31 और https://www.unep.org/en/publications/report/emissions-gap-report-2026