नासा के टेरा उपग्रह की 5 नवंबर 2016 की तस्वीर।
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चित्र: NASA/GSFC/LaRC/JPL, MISR Team · नासा के टेरा उपग्रह की 5 नवंबर 2016 की तस्वीर। Source Licence

दिवाली से पहले दिल्ली में फिर सबकी नज़र हवा की गुणवत्ता के आंकड़े पर होगी। पूरे शहर का एक आंकड़ा एनसीआर में पाबंदियां लगाने का आधार बन सकता है। लेकिन उससे किसी अभिभावक को यह पता नहीं चलता कि स्कूल के पास बन रही इमारत की जांच हुई या नहीं। बस का इंतज़ार कर रहे यात्री को भी उससे यह नहीं पता चलता कि जिस अतिरिक्त बस का वादा था, वह चली या नहीं।

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की आपात योजना में 301 से 400 तक का सूचकांक ‘बहुत खराब’ माना जाता है। योजना के पहले चरण की कार्रवाई 201 से 300 के बीच शुरू होती है। उसमें सड़कों की सफाई, निर्माण स्थलों पर धूल रोकना और खुले में कचरा जलाने पर रोक जैसे उपाय हैं। ये नगर निकायों के रोज़मर्रा के काम हैं। इनका हिसाब भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आना चाहिए जितनी स्पष्टता से बाद में सख्त आदेश जारी होते हैं।

सर्दी शुरू होने से पहले एनसीआर की एजेंसियां हर हफ्ते एक छोटा ब्योरा दें। किन निर्माण स्थलों की जांच हुई, कहां खामी दूर की गई, कचरा जलाने की कितनी शिकायतें निपटीं और किन मार्गों पर अतिरिक्त बसें चलीं? दिल्ली की सीमा के दोनों ओर जिम्मेदार एजेंसी का नाम भी हो। तब लोग अपने इलाके में किए गए काम को सरकारी दावे से मिला सकेंगे।

निर्माण रोकने या यातायात पर पाबंदी की कीमत होती है। श्रमिकों और ठेकेदारों को साफ नियम चाहिए और यात्रियों को आने-जाने का दूसरा साधन। मौसम, पराली की आग और कई राज्यों से आने वाला प्रदूषण भी हवा पर असर डालते हैं। हर एजेंसी फिर भी बता सकती है कि उसने कहां क्या किया और समस्या दोबारा लौटी या नहीं। अगली सर्दी की समीक्षा उसी हिसाब से शुरू होनी चाहिए।