सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : 1. जो कचरा दिखाई नहीं देता, वह भी चिंता का विषय
पर्यावरण संकट की चर्चा होते ही हमारे सामने प्लास्टिक, औद्योगिक प्रदूषण, वाहनों का धुआं और इलेक्ट्रॉनिक कचरा जैसे मुद्दे आते हैं। लेकिन डिजिटल युग ने कचरे का एक ऐसा रूप भी पैदा किया है जो दिखाई नहीं देता। अनावश्यक ईमेल, संदेश, तस्वीरें, वीडियो, डुप्लीकेट फाइलें और वर्षों से क्लाउड में पड़ी अनुपयोगी सामग्री डिजिटल कचरे का हिस्सा बन रही हैं।
यह कचरा जमीन पर ढेर नहीं बनाता, लेकिन इसे सुरक्षित रखने और प्रसारित करने के लिए सर्वर, नेटवर्क और डेटा सेंटर लगातार ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं।
2. हर संदेश पर्यावरण संकट नहीं, सामूहिक व्यवहार बड़ी चुनौती
यह कहना उचित नहीं होगा कि एक अनावश्यक संदेश या ईमेल अपने आप में कोई बड़ा पर्यावरणीय संकट पैदा करता है। वास्तविक समस्या तब बनती है जब करोड़ों लोग रोजाना अरबों डिजिटल गतिविधियां करते हैं।
एक संदेश भेजने, उसे सर्वर पर संसाधित करने, प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने और कई बार वर्षों तक संग्रहित रखने की पूरी डिजिटल श्रृंखला संसाधनों पर निर्भर करती है। इसलिए डिजिटल व्यवहार का पर्यावरणीय असर उसके विशाल पैमाने पर समझना होगा।
3. डेटा सेंटर हैं डिजिटल दुनिया की रीढ़
हमारे मोबाइल में दिखाई देने वाली डिजिटल दुनिया के पीछे विशाल डेटा सेंटर काम करते हैं। ईमेल, सोशल मीडिया सामग्री, ऑनलाइन वीडियो, क्लाउड बैकअप, डिजिटल भुगतान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी सेवाओं को चलाने के लिए इन केंद्रों में हजारों सर्वर लगातार सक्रिय रहते हैं।
भारत में डेटा सेंटर क्षमता 2020 में 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक 1,500 मेगावाट से अधिक हो गई। सरकार के अनुसार उद्योग में पानी और ऊर्जा की खपत कम करने के लिए उन्नत कूलिंग तकनीकों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है।
4. डिजिटल विकास के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी जरूरी
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। डिजिटल भुगतान से लेकर ऑनलाइन शिक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक हर क्षेत्र में डेटा की भूमिका बढ़ रही है।
डिजिटल विकास को रोकना न समाधान है और न ही इसकी जरूरत है। सवाल यह है कि इस विकास को पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। जितना अधिक डेटा बनेगा, उतनी ही अधिक जिम्मेदारी डेटा को ऊर्जा-कुशल तरीके से संभालने की होगी।
5. पानी भी डिजिटल अर्थव्यवस्था का संसाधन है
डेटा सेंटरों की पर्यावरणीय चर्चा केवल बिजली तक सीमित नहीं रह सकती। सर्वरों को ठंडा रखने के लिए कई डेटा सेंटरों में पानी की आवश्यकता होती है।
WRI India के अनुसार भारत के आधे से अधिक डेटा सेंटर जल-संकट वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। इससे स्पष्ट है कि डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार में पानी की उपलब्धता को भी गंभीरता से देखना होगा।
6. एआई के दौर में चुनौती और बढ़ेगी
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने डेटा सेंटरों की भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया है। बड़े एआई मॉडल को प्रशिक्षित और संचालित करने के लिए उच्च कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए। इसका अर्थ है अधिक सर्वर, अधिक बिजली और कई परिस्थितियों में अधिक कूलिंग की आवश्यकता।
इसलिए एआई को केवल तकनीकी क्रांति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसकी ऊर्जा, पानी, भूमि और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से जुड़ी लागत को भी डिजिटल विकास की योजना में शामिल करना होगा।
7. डिजिटल कचरे की सफाई भी जरूरी
हम अपने घरों में पुराने कागज, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक सामान की सफाई करते हैं, लेकिन डिजिटल जीवन में ऐसी सफाई की आदत बहुत कम है।
हजारों पुराने ईमेल, डुप्लीकेट फोटो, अनावश्यक वीडियो, पुराने दस्तावेज और अनुपयोगी क्लाउड बैकअप वर्षों तक पड़े रहते हैं। विशेषज्ञ साहित्य में ऐसे अनावश्यक या कम उपयोग वाले संग्रहित डेटा को ‘डार्क डेटा’ के संदर्भ में भी देखा गया है और इसे कम करने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
8. व्यक्तिगत स्तर पर छोटी शुरुआत संभव
डिजिटल पर्यावरणीय जिम्मेदारी की शुरुआत किसी बड़े अभियान से ही हो, यह जरूरी नहीं। उपयोगकर्ता अनावश्यक ईमेल सूची से बाहर निकल सकते हैं, पुराने मेल और फाइलें हटा सकते हैं, डुप्लीकेट फोटो साफ कर सकते हैं और जरूरत न होने पर बड़ी वीडियो फाइलें बार-बार साझा करने से बच सकते हैं।
वीडियो मीटिंग के दौरान अनावश्यक रूप से वीडियो स्ट्रीमिंग बंद करना जैसे छोटे कदम भी डिजिटल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का हिस्सा हो सकते हैं।
9. जिम्मेदारी केवल उपभोक्ता की नहीं
डिजिटल कचरे का पूरा बोझ नागरिकों पर डालना भी उचित नहीं होगा। बड़ी तकनीकी कंपनियों, डेटा सेंटर संचालकों और संस्थानों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
कंपनियों को यह तय करना होगा कि कौन-सा डेटा वास्तव में आवश्यक है, उसे कितने समय तक रखना जरूरी है और किस डेटा को सुरक्षित तरीके से हटाया जा सकता है। डेटा प्रबंधन की बेहतर नीतियां ऊर्जा और भंडारण की अनावश्यक मांग को कम कर सकती हैं।
10. हरित डेटा सेंटर की दिशा में आगे बढ़ना होगा
भारत को डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार करते हुए डेटा सेंटरों को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने पर जोर देना चाहिए। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग, बेहतर कूलिंग सिस्टम, पानी का पुनर्चक्रण और सर्वर दक्षता इसके महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।
सरकार ने भी डेटा सेंटरों में डायरेक्ट-टू-चिप लिक्विड कूलिंग, इमर्शन कूलिंग और अन्य तकनीकों के इस्तेमाल का उल्लेख किया है, जिनका उद्देश्य पानी और ऊर्जा की खपत कम करना है।
11. जल-संकट वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त सावधानी
डेटा सेंटर लगाने का निर्णय केवल जमीन और बिजली की उपलब्धता देखकर नहीं किया जाना चाहिए। जिस क्षेत्र में पानी पहले से सीमित है, वहां बड़े डेटा सेंटरों की जल जरूरत स्थानीय समुदायों और अन्य उपयोगों पर दबाव डाल सकती है।
इसलिए स्थान चयन में जल उपलब्धता, पुनर्चक्रण क्षमता, स्थानीय पर्यावरण और भविष्य की जल मांग को भी समान महत्व देना होगा। केंद्र सरकार ने भी पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े बड़े निर्माण प्रोजेक्टों में जल उपलब्धता, जल संतुलन और पुनर्चक्रण जैसे पहलुओं पर विचार किए जाने की बात कही है।
12. डिजिटल साक्षरता में पर्यावरण भी शामिल हो
आज डिजिटल साक्षरता का अर्थ मोबाइल और इंटरनेट चलाना, ऑनलाइन भुगतान करना या साइबर धोखाधड़ी से बचना माना जाता है। अब इसमें डिजिटल पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी शामिल करने का समय है।
स्कूलों, कॉलेजों और कार्यालयों में यह समझ विकसित की जानी चाहिए कि डिजिटल गतिविधियां पूरी तरह “अदृश्य” या “शून्य संसाधन” वाली गतिविधियां नहीं हैं।
13. कंपनियां डेटा जमा करने की आदत बदलें
कई संस्थान यह सोचकर बड़ी मात्रा में डेटा जमा करते रहते हैं कि डिजिटल स्टोरेज सस्ता है। लेकिन सस्ता स्टोरेज पर्यावरणीय लागत से मुक्त नहीं होता।
कंपनियों को नियमित डेटा ऑडिट करना चाहिए। अनावश्यक डुप्लीकेट रिकॉर्ड, पुराने असंबंधित दस्तावेज और अनुपयोगी बैकअप की पहचान कर सुरक्षित तरीके से हटाने की नीति बनाई जानी चाहिए।
14. डिजिटल विकास को रोकना समाधान नहीं
यह भी ध्यान रखना होगा कि डिजिटल तकनीक कई मामलों में पर्यावरणीय बोझ कम भी करती है। ऑनलाइन बैठकें यात्रा कम कर सकती हैं, डिजिटल दस्तावेज कागज बचा सकते हैं और डिजिटल सेवाएं कई भौतिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता घटा सकती हैं।
इसलिए बहस “डिजिटल तकनीक अच्छी है या बुरी” पर नहीं होनी चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि डिजिटल तकनीक का उपयोग कितनी दक्षता और जिम्मेदारी से किया जा रहा है।
15. नीति में डिजिटल पर्यावरण का स्थान जरूरी
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होगी, उसके पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन भी उतना ही जरूरी होगा। डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की खपत, कार्बन उत्सर्जन, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और भूमि उपयोग जैसे पहलुओं पर बेहतर आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास संस्था ने भी डिजिटल सेवाओं के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, बेहतर डेटा और पानी प्रबंधन तथा अधिक व्यवस्थित निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया है।
16. पर्यावरण संरक्षण की परिभाषा बदलनी होगी
पर्यावरण संरक्षण अब केवल जंगल बचाने, प्लास्टिक कम करने और प्रदूषण रोकने तक सीमित नहीं रह सकता। डिजिटल युग में सर्वर, डेटा सेंटर, ऊर्जा और जल संसाधन भी पर्यावरणीय बहस का हिस्सा हैं।
जिस तरह हम अपने घर से निकलने वाले भौतिक कचरे के प्रति जिम्मेदार बनने की कोशिश करते हैं, उसी तरह डिजिटल कचरे के प्रति भी जागरूक होना होगा।
निष्कर्ष
डिजिटल क्रांति आधुनिक भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे रोकना न संभव है और न वांछनीय। लेकिन डिजिटल विस्तार को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से अलग भी नहीं किया जा सकता। अनावश्यक संदेश, ईमेल और संग्रहित फाइलें अकेले कोई बड़ा संकट नहीं हैं, लेकिन अरबों डिजिटल गतिविधियों के सामूहिक प्रभाव को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
भारत में डेटा सेंटरों का विस्तार और एआई आधारित सेवाओं की बढ़ती मांग आने वाले वर्षों में बिजली और पानी की जरूरत को और महत्वपूर्ण बनाएगी। इसलिए आज से ही ऊर्जा-कुशल तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा, पानी का पुनर्चक्रण, जिम्मेदार डेटा प्रबंधन और डिजिटल स्वच्छता को डिजिटल विकास का हिस्सा बनाना होगा।
भविष्य का स्वच्छ भारत केवल साफ सड़कों और कम प्रदूषण वाला भारत नहीं होगा; वह जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार और टिकाऊ डिजिटल बुनियादी ढांचे वाला भारत भी होना चाहिए।
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