सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भोपाल में आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर चल रहा विवाद अब केवल सीलिंग की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला शहर की लंबे समय से लंबित शहरी नियोजन व्यवस्था, भूमि उपयोग के बदलते स्वरूप और प्रशासनिक स्पष्टता से भी जुड़ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल की सुनवाई में आवासीय उपयोग के लिए स्पष्ट रूप से निर्धारित क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को रोकने और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर प्रतिष्ठानों को सील करने की बात कही है। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल किसी संपत्ति की वैधता का परीक्षण मौजूदा मास्टर प्लान और संबंधित भवन नियमों के आधार पर होगा।
भोपाल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शहर का मौजूदा मास्टर प्लान लंबे समय से पुराना है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि भोपाल का मास्टर प्लान वर्ष 1995 से संशोधित नहीं हुआ है। ऐसे में पिछले तीन दशकों में शहर का जिस तरह विस्तार हुआ, नई कॉलोनियां बनीं, आबादी बढ़ी और आवासीय इलाकों के आसपास कारोबार विकसित हुआ, उसे पुराने नियोजन ढांचे में पूरी तरह समायोजित करना कठिन है। इसी वजह से आज कई इलाकों में वास्तविक भूमि उपयोग और कागजों पर दर्ज भूमि उपयोग के बीच अंतर दिखाई देता है।
लेकिन पुराना मास्टर प्लान सीलिंग से बचने का आधार नहीं हो सकता। जहां किसी क्षेत्र का उपयोग स्पष्ट रूप से आवासीय है और वहां नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, वहां कानून का पालन आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देने और व्यावसायिक गतिविधि पाए जाने पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में भूमि उपयोग स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है या मिश्रित उपयोग की स्थिति है, वहां अदालत ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने की बात कही है।
यहीं प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। सीलिंग अभियान केवल प्रतिष्ठानों को बंद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कार्रवाई के प्रत्येक मामले में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित संपत्ति किस भूमि उपयोग श्रेणी में आती है, स्वीकृत नक्शे में उसका उपयोग क्या है और किस नियम के उल्लंघन के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। पारदर्शी प्रक्रिया से न केवल रहवासियों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि कारोबारियों को भी अपने कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से समझ आएंगी।
सबसे गंभीर सवाल सील किए गए प्रतिष्ठानों की निगरानी को लेकर है। यदि कोई प्रतिष्ठान बंद या सील किए जाने के कुछ समय बाद फिर खुल जाता है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी भोपाल को लेकर ऐसी शिकायतें रखी गईं कि कुछ संपत्तियां पहले सील हुईं और बाद में बिना किसी स्पष्ट intervening प्रक्रिया के फिर खुल गईं। अदालत ने इस तरह की स्थिति पर चिंता जताई और गैर-भेदभावपूर्ण कार्रवाई पर जोर दिया।
इसलिए नगर निगम को सीलिंग के साथ निगरानी की मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। हर कार्रवाई का डिजिटल रिकॉर्ड, सील की तस्वीर, जियो-टैगिंग, निरीक्षण की तारीख और बाद की जांच दर्ज की जा सकती है। यदि सील तोड़ी जाती है तो तत्काल कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इससे यह संदेश जाएगा कि सीलिंग केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि नियमों के वास्तविक पालन का हिस्सा है।
दूसरी तरफ कारोबारियों की चिंता को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई क्षेत्रों में वर्षों से व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं और उनसे रोजगार तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था जुड़ी है। लेकिन लंबे समय तक किसी गतिविधि का चलना अपने आप में उसे वैध नहीं बना देता। समाधान यह है कि सरकार शहर की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नए मास्टर प्लान में स्पष्ट और व्यावहारिक भूमि उपयोग व्यवस्था तैयार करे।
नए ड्राफ्ट मास्टर प्लान को प्रकाशित कर दावे और आपत्तियां आमंत्रित करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दी है, हालांकि उसे अंतिम रूप देने से पहले अदालत की अनुमति आवश्यक रहेगी। यह अवसर भोपाल के लिए महत्वपूर्ण है। सरकार को इस प्रक्रिया को केवल औपचारिकता नहीं बनाना चाहिए। नागरिकों, कारोबारियों, विशेषज्ञों और स्थानीय निकायों से वास्तविक सुझाव लेकर यह तय करना चाहिए कि आने वाले वर्षों में शहर का विस्तार किस दिशा में होगा और किन क्षेत्रों में आवासीय, व्यावसायिक तथा मिश्रित उपयोग की अनुमति होगी।
भोपाल को अब बार-बार की सीलिंग और विरोध के चक्र से बाहर निकलने की जरूरत है। इसके लिए पुराने नियमों को वर्तमान शहरी वास्तविकताओं से जोड़ना होगा। जहां नियम स्पष्ट हैं, वहां उनका सख्ती से पालन होना चाहिए; जहां नियम अस्पष्ट हैं, वहां नीति स्पष्ट की जानी चाहिए; और जहां मिश्रित भूमि उपयोग की वास्तविक जरूरत है, वहां नियोजित तरीके से उसे मान्यता देने पर विचार होना चाहिए।
शहर का विकास केवल सड़कें, इमारतें और बाजार बढ़ाने का नाम नहीं है। आवासीय क्षेत्रों की शांति, यातायात, पार्किंग, अग्नि सुरक्षा, पर्यावरण और नागरिक सुविधाएं भी शहरी विकास का हिस्सा हैं। इसी तरह कारोबार के लिए पर्याप्त और वैध स्थान उपलब्ध कराना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
भोपाल का मौजूदा विवाद इसलिए एक अवसर भी है। यदि नए मास्टर प्लान को पारदर्शी तरीके से तैयार किया जाता है और सीलिंग कार्रवाई को स्पष्ट नियमों तथा नियमित निगरानी से जोड़ा जाता है, तो लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने दिशा स्पष्ट कर दी है; अब सरकार और नगर निगम की परीक्षा इस बात की है कि वे उस दिशा को जमीन पर कितनी निष्पक्षता और स्थिरता के साथ लागू करते हैं। भोपाल को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें न नियमों की अनदेखी हो और न शहर की वास्तविक जरूरतों की। यही कानून, कारोबार और नागरिक हित के बीच संतुलित शहरी नियोजन का रास्ता है।
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