आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : पद्मश्री कपिल तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा विभिन्न धाराओं का संगम है। इस परंपरा में ज्ञान न तो प्राचीन है और न ही नवीन है। यह सनातन है। भारतीय ज्ञान हमें सिखाता है कि जमीन को न जीता जाता है, न ही हम इसे हार सकते हैं। भारत जमीन जीतने वाली संस्कृति का देश नहीं है। जैसे ही हम इसे मातृभूमि कहते हैं तभी हम इसके विजयी भाव से मुक्त हो जाते हैं।
तिवारी आज रवीन्द्र भवन में स्वराज संस्थान संचालनालय, धर्मपाल शोधपीठ और दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘स्वत्व: पूर्ण स्वराज की दिशा’ दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सनातन का अर्थ है जो हर समय नया है। भारत की ज्ञान परंपरा सनातन रही है। भारत के संयुक्त परिवारों का टूटना एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना है और समाज जिस रास्ते पर चल पड़ा है उसमें अब एकल परिवारों का बचना भी मुश्किल लगता है। उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृति में प्रकृति के लिए कोई शब्द ही नहीं है, क्योंकि जनजातीय संस्कृति प्रकृति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा कि जनजातियों के बीच किसी तरह की राज्य व्यवस्था की आवश्यकता नहीं रही है। जनजातीय लोग सामुदायिक अनुशासन में रहते हैं। कार्यक्रम का संचालन दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक मुकेश कुमार मिश्रा ने किया। आभार स्वराज संस्थान के उप संचालक संतोष कुमार वर्मा ने माना।
आज रिवर्स माइग्रेशन की आवश्यकता: तिवारी ‘वैश्विक समस्याओं के समाधान का भारतीय मार्ग’ विषय पर आयोजित पंचम तकनीकी सत्र में लेखक एवं पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने रिवर्स माइग्रेशन के लिए आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गांव की ओर लौटें। उन्होंने कहा कि धर्मपाल एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी बीसवीं सदी के ऋषि थे। ठेंगड़ी द्वारा दिखाया गया ‘थर्ड वे’ ही एकमात्र वे’ है, जो भारत ही नहीं, विश्व को मार्ग दिखाएगा। इस सत्र में अल्पना त्रिवेदी ने कहा कि भारत के अपने प्रश्न हैं और अपने उत्तर है, हमको उनकी ओर देखना चाहिए। प्राचीनकाल में गुरुकुलों में विद्यार्थी 20 से अधिक विषयों का अध्ययन करते थे।
भारत की संस्कृति टोलरेंस की नहीं, एक्सेप्टेंस की है आनंद ‘दत्तोपंत ठेंगड़ी का भारत बोध’ विषय पर आयोजित तृतीय तकनीकी सत्र में स्वतंत्र लेखक अरुण आनंद ने कहा कि भारत के इतिहास को समझने के लिए भारतबोध होना आवश्यक है। भारत की संस्कृति टोलरेंस की नहीं, एक्सेप्टेंस की रही है। इस सत्र के मुख्य वक्ता पूर्व कुलपति संजीव शर्मा ने कहा कि प्रश्न पूछना आवश्यक है, उसी से समाधान होता है और सत्य का अनुभव होता है। इस सत्र की अध्यक्षता मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय