आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: शास्त्रीय संगीत मूल स्वर है, लयताल तो संगत है लेकिन वो भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। ये बात प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली ने विद्यार्थियों से बात करते हुए कही। स्पिक मैके भोपाल चैप्टर द्वारा आयोजित लेक-डेम (लेक्चर-डेमोंस्ट्रेशन) टी टी नगर स्थित मॉडल स्कूल और राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया जिसमें कलापिनी कोमकली ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन और भजन प्रस्तुत किये।
मॉडल स्कूल में उन्होंने राग अल्हैय्या बिलावल में परम्परागत बंदिसग कवन बतारियो गैलो और सूरदास का भजन गोकुल प्रकट भय और जमुना किनारे मेरो गाँव सुनाया। आर.जी.पी.वी. में दोपहर के अनुकूल राग मधुवंती में निबद्ध बंदिश शिव आद अंत बलवंत जोगी और गोरखनाथ का निर्गुणी भजन काची छे काया थारी सुनाया जिसे विद्यार्थियों ने ख़ूब पसन्द किया। उसके बाद उन्होंने छात्रों की माँग पर गांधी जी के प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए सुनाया।
कलापिनी की प्रस्तुति की ख़ास बात थी कि उन्होंने लय ताल को आसानी से समझाया और श्रोताओं को साथ ताली बजाने को कहा। उन्होंने बताया कि ताल का वलय वक्राकार (घुमावदार) है इसलिए पहली मात्रा के बाद जब चक्र पूरा होता है तब फिर सम आ जाता है। दोनों जगह क़रीब डेढ़ घण्टे चले कार्यक्रम में किशोर और नवयुवा इंजीनियरिंग के छात्र-छात्राओं ने बहुत आनन्द उठाया और वो प्रस्तुति में निरन्तर शामिल रहे।
तबले ओर संगत पवन सेन और हारमोनियम पर दीपक खसरवाल ने की। इंजीनियरिंग के एक छात्र के प्रश्न के जवाब में कलापिनी ने कहा कि शास्त्रीय संगीत कोई चार साल का कोर्स नहीं है कि डिग्री मिली और प्रोफ़ेशनल बन गए, इसके लिए जीवन भर सीखना पड़ता है और रियाज़ करना पड़ता है। कार्यक्रम में रा.गा. वि.वि. के उपकुलपति सुनील कुमार, मॉडल स्कूल की प्राचार्या रेखा शर्मा, संकाय सदस्य और सॉस मैके के पदाधिकारी उपस्थित थे।