आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय के सभागार कक्ष में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हिंदी दिवस कार्यक्रम के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक एवं साहित्यकार इंदिरा दांगी उपास्थित थीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति संजय तिवारी ने की। हिंदी दिवस के अवसर पर इंदिरा दांगी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत, मातृभाषा पर आधारित एक कविता से की। उन्होंने कहा कि, पाठ्यक्रम और जीवन में अंतर होता है। जो हमे पढ़ाया जाता है, वह जीवन में नहीं होता है। वैदिक, संस्कृत दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है। उसके बाद लौकिक संस्कृत आई, जो लोक की भाषा थी l लौकिक संस्कृत में साहित्य रचने लगे तो पाली भाषा उत्पन्न हुई, जब साहित्य पाली भाषा में लिखा गया तो अपभ्रंश भाषा का उदय हुआ और अपभ्रंश भाषा के बाद ही हिंदी भाषा ने जन्म लिया। दांगी ने यह भी कहा कि, हिंदी अपने आप को हमेशा विकसित करती रहती है l हिंदी भाषा आज भारत की संपर्क भाषा है, और सही मायने में कहा जाए तो संपर्क भाषा ही तो राष्ट्रभाषा होती है। दांगी ने इस बात पर अप्रसन्नता ज़ाहिर की कि, प्राचीन भाषाएं नवीन भाषाओं को स्थान नहीं देती है। उन्होंने कहा कि, हिंदी सरकारी संस्थाओं के बचाने से नहीं बचेगी, हिंदी बचेगी तो उसकी अपनी अंदरूनी ताकत से, हिंदी के विशाल बाजार से, और हिंदी में रोज़गार के अवसर से। भाषा सोचने, बोलने और रचना का माध्यम होती है। भाषा संवाद का माध्यम है, विवाद का नहीं।
कार्यक्रम के अध्यक्ष भोज मुक्त विश्वविद्यालय की कुलपति संजय तिवारी ने कहा कि हिंदी हमारी माता की तरह है। अपनी भाषा का हमें सम्मान करना चाहिए। हिंदी हमें एक सूत्र में बांधती है। तिवारी ने कहा कि यदि हिंदी नहीं होती तो शायद हमें स्वतंत्रता नहीं मिल पाती। उन्होंने कहा कि, आप सोते जागते समय जो भाषा बोलते हैं, वही आपकी मातृभाषा होती है। हिंदी भाषा के महत्व को देखते हुए कंप्यूटर को भी अपने सॉफ्टवेयर की भाषा में हिंदी को जोड़ना पड़ा। उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की कि जब भारत अपनी 100 वीं वर्षगांठ मना रहा होगा, तो हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होगी। कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन केंद्र की निदेशक अनीता कौशल ने कहा की हिंदी में बिंदी की महत्ता बहुत अधिक है। उन्होंने कहा कि जिस भाषा में भी कार्य करें, उसे शुद्धता से करें, सही भाषा लिखें और उसका सही उच्चारण भी करें।