सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ भोपाल: सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ / एजेंसियां, भोपाल: सर्दियों की दस्तक के साथ मौसम में बदलाव का असर केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। दिन छोटे होने, धूप कम मिलने और ठंड के कारण घरों में अधिक समय बिताने से कई लोगों में उदासी, सुस्ती और थकान बढ़ने लगती है। इसे आम भाषा में ‘विंटर ब्लूज’ कहा जाता है। कुछ मामलों में यह समस्या सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) यानी मौसमी अवसाद का रूप ले सकती है। इसका असर विद्यार्थियों से लेकर नौकरीपेशा लोगों और गृहिणियों तक में दिखाई दे सकता है।
धूप की कमी से प्रभावित होती है बॉडी क्लॉक मनोचिकित्सकों के अनुसार, सर्दियों में प्राकृतिक रोशनी कम मिलने से शरीर की जैविक घड़ी यानी सर्केडियन रिदम प्रभावित हो सकती है। इससे नींद और जागने का चक्र बिगड़ता है। सेरोटोनिन और मेलाटोनिन जैसे मस्तिष्क के रसायनों में होने वाले बदलाव भी मनोदशा और ऊर्जा के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। सुबह अंधेरे में ऑफिस जाने और शाम को अंधेरा होने के बाद लौटने वाले कर्मचारियों को पर्याप्त प्राकृतिक रोशनी नहीं मिल पाती। वहीं, परीक्षा की तैयारी में जुटे विद्यार्थी लंबे समय तक कमरे में रहने और स्क्रीन के सामने बैठने के कारण थकान तथा एकाग्रता की कमी महसूस कर सकते हैं।
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज लगातार उदासी, चिड़चिड़ापन, काम में रुचि कम होना, अत्यधिक नींद या अनिद्रा, मीठा और कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन खाने की इच्छा, वजन बढ़ना, थकान और सामाजिक गतिविधियों से दूरी इसके प्रमुख लक्षण हो सकते हैं। यदि इनका असर पढ़ाई, नौकरी या रोजमर्रा के जीवन पर पड़ने लगे तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।
धूप, व्यायाम और काउंसलिंग से मिल सकती है राहत प्राकृतिक रोशनी में रोजाना कुछ समय बिताना, सुबह टहलना, नियमित व्यायाम करना, संतुलित भोजन लेना और सोने-जागने का समय तय रखना मददगार हो सकता है। परिवार और दोस्तों के साथ संपर्क बनाए रखना भी जरूरी है। गंभीर लक्षणों में विशेषज्ञ की सलाह पर कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी, दवाओं या लाइट थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। लाइट थेरेपी शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उदासी और अन्य लक्षण दो सप्ताह से अधिक बने रहें, बढ़ते जाएं या दैनिक जीवन प्रभावित करने लगें तो इसे सामान्य मौसमी बदलाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय सहायता लेने से स्थिति को बेहतर ढंग से संभाला जा सकता है।
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