सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान तथा राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में “शास्त्र से संस्कृति तक : संस्कृति वाङ्मय में भारतीय ज्ञान-परंपरा का स्वरूप” विषय पर एक दिवसीय उन्मुखीकरण व्याख्यान का आयोजन किया गया।

मुख्य वक्ता त्रिपुरा केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में सह प्राध्यापक डॉ. विश्वबंधु ने अपने उद्बोधन का आरंभ महाकवि कालिदास की उक्ति के माध्यम से करते हुए शिक्षित व्यक्ति के दायित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी विषय का वास्तविक ज्ञान केवल इंद्रियों से ग्रहण कर लेने में नहीं, बल्कि उसे अनुभूति के स्तर तक आत्मसात कर अपने शिष्यों एवं समाज तक पहुँचाने में निहित है।

डॉ. विश्वबंधु ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल प्रश्नों की चर्चा करते हुए “शास्त्र” और “संस्कृति” के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि शास्त्र और संस्कृति एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि परस्पर पूरक एवं अभिन्न हैं। वर्तमान समय में शास्त्र को संस्कृति से अलग करने का प्रयास अकादमिक दृष्टि से उचित नहीं है, क्योंकि संस्कृति का उद्भव शास्त्र से होता है तथा समाज उसी के आधार पर अपनी जीवन-पद्धति का निर्माण करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शास्त्र लोकजीवन, लोकाचार और सामाजिक आचरण को प्रमाणिकता प्रदान करते हैं।

विश्वबंधु ने विशेष रूप से इस भ्रांति को दूर किया कि “परंपरा” का अर्थ “Tradition” नहीं है। उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ी का Tradition एक निश्चित एवं स्थिर स्वरूप का बोध कराता है, जबकि भारतीय संदर्भ में परंपरा निरंतर विकसित होने वाली, परिवर्तनशील और पुनर्नवा प्रक्रिया है। उन्होंने महर्षि पाणिनि, महर्षि वाल्मीकि तथा विभिन्न आचार्यों के उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निरंतर विमर्श, पुनर्विचार और सिद्धांतों का विकास होता रहा है। प्रत्येक आचार्य ने अपने समय के अनुसार ज्ञान का विस्तार किया और इसी से परंपरा का निर्माण हुआ।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जो प्राचीन है, वही सनातन है। अथर्ववेद में भी सनातन की इसी अवधारणा का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों की उपमा सदैव नदी से दी जाती है, क्योंकि नदी की भाँति शास्त्र भी सतत प्रवाहित होते हैं और निरंतर समाज को जीवनदायिनी दिशा प्रदान करते हैं।

अनुसंधान की भारतीय पद्धति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जिस शास्त्र के माध्यम से संसार की मौलिकता का बोध होता है, वही दर्शन है। उन्होंने अनुसंधान की प्रक्रिया में “किम्, केन और कथन” जैसे मूल प्रश्नों की महत्ता पर बल दिया तथा कहा कि भारतीय अनुसंधान पद्धति में मीमांसा एक सशक्त कार्यविधि के रूप में स्थापित है। भारतीय ज्ञान परंपरा किसी एक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं, बल्कि विविध दृष्टियों और बहुआयामी चिंतन से समृद्ध है।

भारतीय स्त्री-दृष्टि पर विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में स्त्री को केवल विमर्श का विषय नहीं माना गया, बल्कि उसे सृष्टि के मूल आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। उन्होंने बताया कि चौंसठ योगिनियाँ संस्कृत की चौसठ ध्वनियों की परिकल्पना हैं। उन्होंने कहा कि पितृसत्तात्मक अस्तित्व माता से ही जन्मा है। इस ब्रह्मांड का सृजन बिन्दु ही स्त्री है। मातृशक्ति से ही समस्त अस्तित्व का विस्तार हुआ है और यही भारतीय चिंतन की मूल भावना है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल सनातन ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भारतीय संस्कृति के संपूर्ण वाङ्मय का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि आज जब देश नए बौद्धिक विमर्श की ओर अग्रसर है, तब हमारे प्राचीन वाङ्मय का पुनर्पाठ और पुनर्मूल्यांकन हो रहा है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि पिछले कुछ दशकों में हम अपनी मातृभाषाओं और मूल भाषाओं से दूर होते गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम अपनी जड़ों और भारतीयता से भी दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम दो सौ वर्ष पूर्व के साहित्य और ग्रंथों का गंभीर अध्ययन करें तो भारतीय जीवन-दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना का वास्तविक बोध प्राप्त होगा।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. सी. सी. त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता अपने मूल ग्रंथों, शास्त्रों और भारतीय ज्ञान-संपदा का गंभीर अध्ययन है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य प्रभाव के कारण भारतीय समाज धीरे-धीरे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होता जा रहा है। यदि हमें आत्मनिर्भर एवं आत्मबोध से युक्त राष्ट्र का निर्माण करना है, तो भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्रोतों का अध्ययन और उनका व्यवहारिक जीवन में पुनर्स्थापन आवश्यक है।

व्याख्यान के बाद आयोजित जिज्ञासा समाधान सत्र में विभिन्न प्रश्न रखे गए, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तारपूर्वक समाधान किया।

मंचासीन अतिथियों में प्रो. अल्पना त्रिवेदी, डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा, डॉ. विश्वबंधु, डॉ. चंद्र चारु त्रिपाठी, तथा डॉ. पी. के. पुरोहित उपस्थित रहे।

अंत में प्रो. अल्पना त्रिवेदी ने अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित ऐसे व्याख्यान केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज और शिक्षा जगत में भारतीय दृष्टि के पुनर्जागरण का आधार बनते हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार के कार्यक्रम भविष्य में भी निरंतर आयोजित होते रहेंगे तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा, अनुसंधान और सामाजिक जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

कार्यक्रम में संस्थान के संकाय सदस्य, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में शिक्षाविद् उपस्थित रहे।


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