सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र ने बताई 80 दशक की ‘अदृश्य जाति व्यवस्था’
नई दिल्ली। आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र और उद्यमी रमेश श्रीवत्स ने 1980 के दशक में संस्थान के अपने अनुभव साझा करते हुए कैंपस की एक अनौपचारिक ‘जाति व्यवस्था’ का जिक्र किया है। हालांकि, उन्होंने ‘जाति’ शब्द का इस्तेमाल जन्म या सामाजिक पृष्ठभूमि के अर्थ में नहीं, बल्कि छात्रों के बीच बदलती शैक्षणिक और पेशेवर पदानुक्रम के लिए किया।
श्रीवत्स के अनुसार, आईआईटी मद्रास में शुरुआत में छात्रों की स्थिति उनकी जेईई रैंक से तय होती थी। बेहतर रैंक को ऊंची सामाजिक स्थिति जैसा माना जाता था। करीब छह महीने बाद यह पदानुक्रम शाखा के आधार पर बदल जाता था, जिसमें कंप्यूटर साइंस, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल और अन्य शाखाओं के बीच अनौपचारिक अंतर महसूस किया जाता था। उन्होंने अपने एक अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि पहले वर्ष में भौतिकी विषय में असफल होने के बाद जब वे प्रोफेसर से मिले, तो उनसे उनकी शाखा पूछी गई। उनके कंप्यूटर साइंस बताने पर प्रोफेसर ने आश्चर्य जताया, जबकि उनके साथ मौजूद मेटलर्जी के छात्र के बारे में अलग टिप्पणी की गई। यह उदाहरण उन्होंने उस समय की शाखा आधारित मानसिकता को समझाने के लिए साझा किया।
श्रीवत्स के मुताबिक दूसरे और तीसरे वर्ष में शाखा की जगह जीपीए महत्वपूर्ण हो गया। अंतिम वर्ष तक छात्रों के बीच आगे की पढ़ाई, विदेश में प्रवेश और नौकरी जैसी उपलब्धियां सामाजिक स्थिति के अनौपचारिक पैमाने बन गईं। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था की खास बात यह थी कि यह हर साल बदलती थी और जन्म या परिवार से निर्धारित नहीं होती थी। उनकी टिप्पणी मौजूदा समय में आईआईटी परिसरों में जातिगत भेदभाव को लेकर चल रही चर्चा के बीच सामने आई है।
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