सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : वनमाली सृजन पीठ और आईसेक्ट पब्लिकेशन द्वारा ‘पाठ श्रृंखला’ के अंतर्गत सविता भार्गव’ के उपन्यास ‘जहाज पाँच पाल वाला’ पर साहित्यिक चर्चा का आयोजन किया गया।
यह आयोजन संतोष चौबे, वरिष्ठ कवि– कथाकार, कुलाधिपति, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के आत्मीय सान्निध्य में वनमाली सृजन पीठ, भोपाल के सभागार में आयोजित किया गया।
सर्व प्रथम सविता भार्गव ने अपने नवीन उपन्यास ‘जहाज पाँच पाल वाला’ के कुछ अंशों का बहुत सुंदर पाठ किया। उनके पाठ ने सभी श्रोताओं के मन को गहराई तक प्रभावित किया। उन्होंने उपन्यास लेखन पर बोलते हुए कहा कि उपन्यास का कथानक और पृष्ठभूमि आज से तीस-चालीस वर्ष पूर्व की है। उस वक्त महिलाओं के जीवन के अपने संघर्ष, चुनौतियाँ, सीमाएँ थी। इनके बरक्स विचलन और तमाम तरह के विस्थापन भी थे। उनको ध्यान में रखते हुए यह उपन्यास रचा गया है। उपन्यास लेखन करते हुइ मैंने जाना कि उपन्यास लेखन एक रचनाकार से बहुत अधिक समय, धेर्य, और एकाग्रता की मांग करता है। उपन्यास लेखन अनुभव की मांग भी करता है। उपन्यास यथार्थ पर केंद्रित रचना होती है।
उन्होंने आगे कहा कि एक कामकाजी महिला लेखिका के सामने बहुत सारी चुनौतियाँ होती हैं। उसको अपने पारिवारिक जीवन, रिश्ते नाते, कार्य और समाजिकता को निभाने हुए रचनाकर्म करना होता है।
संतोष चौबे ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सविता भार्गव ने ‘जहाज पाँच पाल वाला’ के चुनिंदा अंशों का पाठ इतनी सुंदरता और भावनात्मकता के साथ किया है कि हम सभी स्तब्ध हैं। अच्छा पाठ भी वही होता हैं जो आपको स्तब्ध कर दें। उनके उपन्यास का गद्य बहुत ही काव्यात्मक है जो सीधे आपके अंतर्मन को छूता हैं। एक स्त्री रचनाकार द्वारा तमाम विस्थापनों के बाद अर्जित काव्य भाषा ही उसका अपना घर होता है। एक स्त्री अपने जीवन में घर, परिवार, शहर के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, मानसिक रूप से भी विस्थापन को भोगने को विवश होती रहती है। यही विस्थापन विचलन के साथ साथ उसे दृढ़ता भी प्रदान करता है।
संतोष चौबे ने आगे कहा कि सविता भार्गव ने अपने उपन्यास में जो भाषा रची है वह ग्रासरूट लेवल की बहुत ही अद्भुत भाषा है। उन्होंने भाषा के फलक को विस्तारित करते हुए उसका रचनात्मक रूप से परिमार्जन भी किया है। उनके लेखन में वीट भी गजब का है। वह वीट आपको हँसता भी है और उद्वेलित भी करता हैं। उनके लेखन में भावनात्मक पक्ष के फलक का विस्तार और करुणा का उद्वेग भी परिलक्षित होता दिखाई पड़ता है। सविता स्वयं थियेटर और टीवी की एक उम्दा कलाकार हैं अतः उन्होंने अपने उपन्यास में भी नाटकों और फिल्मों को लेकर काफी गंभीरतापूर्वक लिखा है। ‘जहाज पाँच पाल वाला’ पढ़ने हुए स्त्रियों के बीच जो ‘बहनापा’ होता है, उसके प्रति नई समझ बनती है। यह उपन्यास स्त्री संघर्ष की एक गाथा के रूप में पाठकों के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ता है।
वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि सविता भार्गव ने अपना उपन्यास ‘जहाज पाँच पाल वाला’ बहुत ऑनेस्टी के साथ लिखा है। स्त्री लेखन के सामने कई तरह की चुनौतियाँ होती है। आज के समय में बाजार ने सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में स्त्रियों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। बाजार के बढ़ते दबाव के चलते कहाँ-कहाँ से, किन-किन रास्तों से गुलामी स्त्रियों को अपने मोहपाश में जकड़ रहा है, उससे स्त्रियाँ कैसे निपटेंगी यह बहुत गंभीर सवाल मुँह बाये खड़ा हैं। सविता स्त्रियों के विस्थापन, विचलित और चुनौतियों को जानती पहचानती है। इनकी कविताओं में जो दर्द है, वह इस उपन्यास में फूट पड़ा है।
वरिष्ठ कवि और उपन्यासकार नीलेश रघुवंशी ने इस अवसर पर कहा की सविता ने अपने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन के संघर्षों की दास्तान को बहुत
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