सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : गांधीनगर में आयोजित विश्व सर्कुलर इकोनॉमी फोरम-2026 ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाली अर्थव्यवस्था केवल अधिक उत्पादन और अधिक खपत पर आधारित नहीं रह सकती। संसाधनों की सीमित उपलब्धता, बढ़ता कचरा, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की चुनौतियां अब दुनिया को ऐसी आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए मजबूर कर रही हैं, जिसमें वस्तुओं और संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो और उनका मूल्य लंबे समय तक अर्थव्यवस्था में बना रहे। फोरम में 60 से अधिक देशों के करीब 2,700 प्रतिनिधियों और 260 वक्ताओं की भागीदारी इस विषय की वैश्विक गंभीरता को दर्शाती है।

1. कचरा अब केवल पर्यावरण की समस्या नहीं

परंपरागत अर्थव्यवस्था का मॉडल रहा है—संसाधन निकालना, उत्पाद बनाना, इस्तेमाल करना और फिर फेंक देना। यह व्यवस्था लंबे समय तक आर्थिक विकास का आधार रही, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव और कचरे की बढ़ती मात्रा ने इसकी सीमाएं सामने ला दी हैं। सर्कुलर इकोनॉमी इसी सोच को बदलने का प्रयास है। इसका लक्ष्य उत्पादों को लंबे समय तक उपयोग में रखना, मरम्मत, पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और पुनर्निर्माण के माध्यम से संसाधनों को दोबारा अर्थव्यवस्था में लाना है।

2. भारत के लिए यह बदलाव विशेष महत्व रखता है

भारत तेजी से शहरीकरण, औद्योगीकरण और उपभोग के विस्तार के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में ई-कचरा, प्लास्टिक, पुराने वाहन, निर्माण सामग्री, धातु और सौर उपकरणों से निकलने वाला कचरा आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती बन सकता है। लेकिन यही चुनौती रोजगार, नए उद्योग और कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत का अवसर भी बन सकती है।

3. केवल रीसाइक्लिंग पर्याप्त नहीं

सर्कुलर इकोनॉमी को केवल कचरे को रीसाइकिल करने तक सीमित करना इसकी व्यापक संभावनाओं को छोटा कर देगा। फोरम में उत्पाद के डिजाइन से ही उसकी लंबी आयु, मरम्मत और पुन: उपयोग को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया। इसका अर्थ है कि किसी वस्तु के कचरा बनने के बाद समाधान खोजने के बजाय उसके निर्माण के समय ही यह सोचा जाए कि उसका जीवन कैसे बढ़ाया जा सकता है।

4. ‘मरम्मत पहले, बदलाव बाद में’ की सोच

भारत में मरम्मत और पुन: उपयोग की संस्कृति नई नहीं है। पुराने कपड़ों से लेकर मशीनों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और वाहनों तक कई वस्तुओं को लंबे समय तक इस्तेमाल करने की परंपरा रही है। आधुनिक सर्कुलर इकोनॉमी इसी व्यवहार को तकनीक, मानकों और औपचारिक बाजार से जोड़ सकती है। टिकाऊ उत्पाद और आसानी से उपलब्ध मरम्मत सेवाएं उपभोक्ता का खर्च भी कम कर सकती हैं।

5. उद्योग की जिम्मेदारी बढ़ानी होगी

कंपनियों को अपने उत्पाद के पूरे जीवनचक्र की जिम्मेदारी लेने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर व्यवस्था इसी सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार के अनुसार भारत में ईपीआर व्यवस्था के तहत 83,000 से अधिक उत्पादक और 4,800 से अधिक पुनर्चक्रणकर्ता पंजीकृत हैं तथा 48 मिलियन टन से अधिक कचरे का प्रसंस्करण किया जा चुका है।

6. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा बन सकते हैं परिवर्तन के साधन

सर्कुलर इकोनॉमी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा की भूमिका तेजी से बढ़ सकती है। किसी वाहन या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के उपयोग और उसके खराब होने के आंकड़ों से निर्माता यह समझ सकते हैं कि कौन-से हिस्से अधिक टिकाऊ हैं और किन्हें दोबारा उपयोग किया जा सकता है। एआई आधारित प्रणालियां पुराने उत्पादों की पहचान, सामग्री की छंटाई और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया को अधिक कुशल बना सकती हैं।

7. स्थानीय निकायों की क्षमता मजबूत करना जरूरी

सर्कुलर इकोनॉमी की सफलता केवल राष्ट्रीय नीतियों से नहीं होगी। घरों, बाजारों और उद्योगों से निकलने वाले कचरे का पहला प्रबंधन स्थानीय स्तर पर होता है। यदि गीला और सूखा कचरा अलग नहीं किया जाएगा, तो पुनर्चक्रण की लागत बढ़ेगी और उपयोगी सामग्री भी नष्ट होगी। नगर निकायों को वैज्ञानिक संग्रह, पृथक्करण, प्रसंस्करण और निगरानी के लिए पर्याप्त संसाधन और तकनीक उपलब्ध करानी होगी।

8. अनौपचारिक क्षेत्र को व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा

भारत में कचरा संग्रह और पुनर्चक्रण में अनौपचारिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। कचरा बीनने वाले और छोटे स्तर के कबाड़ी लंबे समय से पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अर्थव्यवस्था में वापस ला रहे हैं। उन्हें केवल अनौपचारिक श्रमिक मानने के बजाय प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण, सामाजिक सुरक्षा और औपचारिक बाजार से जोड़ना जरूरी है।

9. सर्कुलर इकोनॉमी रोजगार का नया क्षेत्र बन सकती है

रीसाइक्लिंग, मरम्मत, री-मैन्युफैक्चरिंग, कचरा प्रबंधन, सामग्री विज्ञान, डिजिटल ट्रैकिंग और पर्यावरणीय सेवाओं में नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। इसलिए कौशल विकास कार्यक्रमों को सर्कुलर इकोनॉमी की जरूरतों से जोड़ना आवश्यक है। विशेष रूप से युवाओं और स्टार्टअप के लिए यह उभरता हुआ क्षेत्र नए व्यवसाय मॉडल का आधार बन सकता है।

10. वित्त के बिना बदलाव संभव नहीं

सर्कुलर मॉडल अपनाने के लिए उद्योगों को नई मशीनरी, अनुसंधान, संग्रह नेटवर्क और प्रसंस्करण संयंत्रों में निवेश करना होगा। इसलिए बैंकिंग व्यवस्था, निवेशक और सरकारें ऐसे व्यवसायों के लिए वित्तीय तंत्र विकसित करें जो संसाधन दक्षता और पुनर्चक्रण पर आधारित हों। फोरम में वित्त, निवेश और साझेदारी को सर्कुलर बदलाव के महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में रेखांकित किया गया।

11. पुनर्चक्रित सामग्री की गुणवत्ता बड़ी चुनौती

उद्योगों के लिए केवल पुनर्चक्रित सामग्री उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। उसकी गुणवत्ता, मात्रा और निरंतर आपूर्ति भी सुनिश्चित करनी होगी। वाहन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने भी पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता वाली पुनर्चक्रित सामग्री की उपलब्धता को चुनौती बताया है। इसके लिए मानकीकरण, प्रमाणन और बेहतर संग्रह नेटवर्क की आवश्यकता होगी।

12. वैश्विक सहयोग के बिना संसाधन चक्र अधूरा रहेगा

आज उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाएं राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। एक देश में कच्चा माल, दूसरे में उत्पादन और तीसरे में उपभोग हो सकता है। इसलिए पुनर्चक्रित सामग्री और द्वितीयक कच्चे माल के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक और व्यापार व्यवस्था विकसित करनी होगी। विकासशील देशों के लिए तकनीक और वित्त तक पहुंच भी महत्वपूर्ण होगी।

13. उपभोक्ता की भूमिका भी निर्णायक

सर्कुलर इकोनॉमी केवल सरकार और उद्योग की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। उपभोक्ता भी टिकाऊ और मरम्मत योग्य उत्पादों को प्राथमिकता देकर बदलाव को गति दे सकते हैं। अनावश्यक रूप से जल्दी उत्पाद बदलने की आदत कम करना, कचरे का पृथक्करण और पुन: उपयोग की संस्कृति अपनाना इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

14. भारत को अपनी पारंपरिक समझ को आधुनिक तकनीक से जोड़ना होगा

भारत में संसाधनों के पुन: उपयोग और मरम्मत की परंपरा लंबे समय से रही है। अब आवश्यकता इस परंपरा को आधुनिक तकनीक, औद्योगिक मानकों और वैश्विक बाजार से जोड़ने की है। ‘मरम्मत पहले, फेंकने से पहले पुन: उपयोग और कचरे से पहले संसाधन की पहचान’ जैसी सोच सर्कुलर अर्थव्यवस्था की मजबूत आधारशिला बन सकती है। भारत सरकार ने भी फोरम में इसी प्रकार की भारतीय सर्कुलर परंपराओं को रेखांकित किया।

15. सम्मेलन से आगे अब क्रियान्वयन की परीक्षा

गांधीनगर सम्मेलन में चर्चा और विचारों के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण क्रियान्वयन का है। फोरम के समापन पर भी सर्कुलर समाधानों को व्यापक स्तर पर लागू करने और सहयोग को जमीन पर उतारने पर जोर दिया गया।

निष्कर्ष

सर्कुलर इकोनॉमी का अर्थ केवल कम कचरा पैदा करना नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की पूरी सोच को बदलना है। उत्पाद का डिजाइन, उत्पादन, उपयोग, मरम्मत, पुन: उपयोग और अंततः पुनर्चक्रण—इन सभी चरणों को एक-दूसरे से जोड़ना होगा।

भारत के सामने अवसर बड़ा है। यदि नीति, उद्योग, तकनीक, वित्त और नागरिक भागीदारी एक दिशा में आगे बढ़ें तो कचरे को बोझ के बजाय संसाधन में बदला जा सकता है। इससे पर्यावरणीय दबाव कम होगा, आयातित कच्चे माल पर निर्भरता घट सकती है और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

गांधीनगर में हुई वैश्विक चर्चा का वास्तविक मूल्य तभी सामने आएगा जब उसका असर उद्योगों की उत्पादन पद्धति, शहरों की कचरा व्यवस्था और आम नागरिक की उपभोग आदतों में दिखाई दे। सर्कुलर अर्थव्यवस्था भविष्य की पर्यावरण नीति भर नहीं, बल्कि संसाधन-सुरक्षित और टिकाऊ आर्थिक विकास की आवश्यकता है।


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