सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर चुप्पी साधने के बजाय समय रहते बातचीत शुरू करना किसी की जिंदगी बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसी संदेश के साथ भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के मनोचिकित्सा विभाग की ओर से आयोजित विश्व आत्महत्या रोकथाम सप्ताह का समापन हुआ। “आत्महत्या पर दृष्टिकोण बदलें – बातचीत शुरू करें” विषय पर आयोजित सप्ताह के अंतिम दिन कार्यशाला में 120 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यशाला का आयोजन नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी, भोपाल एवं बीएमएचआरसी के संयुक्त तत्वाधान में किया गया। कार्यक्रम में संस्थान की प्रभारी निदेशक डॉ. मनीषा श्रीवास्तव ने कहा कि जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं, जब व्यक्ति निराशा और उलझन से घिर जाता है और उसे समझ नहीं आता कि समस्या से कैसे बाहर निकला जाए। ऐसे समय में सकारात्मक सोच बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुश्किल दौर हमेशा नहीं रहता और यह समय भी गुजर जाएगा। विद्यार्थियों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि किसी एक परीक्षा में असफलता को जीवन की हार नहीं मानना चाहिए। अगली परीक्षा की तैयारी दोगुने उत्साह और आत्मविश्वास के साथ करनी चाहिए। यही सोच व्यक्ति को जीवन की हर चुनौती से लड़ने की ताकत देती है।
विशिष्ट अतिथि स्नेहल गुप्ता, एसोसिएट प्रोफेसर, मनोचिकित्सा विभाग, एम्स भोपाल ने कहा कि जीवन में मानसिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां आती रहती हैं। इन परिस्थितियों में मनोबल टूटने नहीं देना चाहिए और निराशा को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि संकट के क्षणों में सकारात्मक सोच बनाए रखते हुए मदद और संवाद का रास्ता अपनाना जरूरी है। राजेश सिंह यादव, प्रोफेसर एवं एसोसिएट डीन, स्कूल ऑफ फॉरेंसिक साइंस, भोपाल ने कहा कि आत्महत्या के विचार के पीछे कई कारण हो सकते हैं। उन्होंने कोविड के बाद आत्महत्या की प्रवृत्ति से जुड़े शोधों का उल्लेख करते हुए कहा कि रोकथाम के लिए गेटकीपर जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम महत्वपूर्ण हैं। ऐसे प्रशिक्षण लोगों को संकट में फंसे व्यक्ति की पहचान करने और समय पर सहायता उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं।
मनोचिकित्सा विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ज्योत्सना जैन ने जुलाई 2024 में शुरू किए गए छात्र कल्याण केंद्र की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केंद्र के माध्यम से तनाव प्रबंधन सेमिनार, योग सत्र, मूवी क्लब, वृक्षारोपण अभियान और रैगिंग विरोधी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि आत्महत्या को कमजोरी का संकेत मानने के बजाय इसे संकट की अवस्था के रूप में समझने की जरूरत है। ऐसे समय में व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय उसकी बात सुनना और संवाद कायम करना महत्वपूर्ण है। कार्यशाला का समन्वय मनोचिकित्सा विभाग की सहायक प्रोफेसर वी. साई श्रीजा ने किया।
गेटकीपर प्रशिक्षण के तहत जोखिम मूल्यांकन पर समूह चर्चा और क्यूपीआर (प्रश्न पूछना, समझाना और संदर्भ देना) तकनीक पर आधारित रोल प्ले प्रस्तुत किए गए। कार्यशाला में आत्महत्या से जुड़े मिथकों को दूर करने के साथ चेतावनी संकेतों, जोखिम एवं सुरक्षात्मक कारकों और संकट की स्थिति में सहायता पहुंचाने के तरीकों पर भी चर्चा की गई। इस कार्यशाला में नेशनल फोरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी, भोपाल की फ़ैकल्टी सहित विद्यार्थियों ने भी भाग लिया। इस अवसर पर पोस्टर प्रतियोगिता के प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में संस्थान अधिकारी, कर्मचारी एवं पीजी विद्यार्थीगण मौजूद थे।
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