सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान तथा उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में “संस्कृत वाङ्मय और भारतीय ज्ञान-परंपरा: सभ्यतागत चेतना की पुनर्प्रतिष्ठा” विषय पर उन्मुखीकरण व्याख्यान का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. विश्वबंधु (त्रिपुरा विश्वविद्यालय) उपस्थित रहे। मंचासीन अतिथियों में डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा, प्रो. अल्पना त्रिवेदी, डॉ. प्रज्ञेश अग्रवाल एवं प्रो. प्रज्ञा नायक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के प्रारंभ में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने भारतीय ज्ञान परंपरा की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान का विशाल भंडार संस्कृत ग्रंथों एवं भारतीय वाङ्मय में निहित है। आवश्यकता इस बात की है कि इस ज्ञानधारा की पुनः प्रतिष्ठा की जाए तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली को उसके वास्तविक स्वरूप में समाज के समक्ष पुनर्स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि ज्ञान में निरंतर आलोकित रहने वाली सभ्यता है। ‘भारत’ का अर्थ ही प्रकाश एवं ज्ञान से जुड़ा हुआ है; ज्ञान में निरंतर रत रहने वाली भूमि ही भारत है।

डॉ. मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में हमारी अकादमिक सोच लंबे समय तक पाश्चात्य विमर्श से प्रभावित रही है, जिसके कारण हम अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल स्वरूप को पर्याप्त रूप से समझ नहीं पाए। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीयता आधारित शिक्षा को पुनः स्थापित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक जड़ों से जोड़ने का अवसर प्रदान करेगी।

संस्कृत वाङ्मय और भारतीय ज्ञान-परंपरा पर उन्मुखीकरण व्याख्यान आयोजित

मुख्य वक्ता विश्वबंधु ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, नैतिक मूल्यों एवं भारतीय जीवन-दृष्टि पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने महाकवि भवभूति के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि चेतन सत्ता के रूप में देखा गया है। उन्होंने वनदेवी की अवधारणा के माध्यम से प्रकृति के मानवीय स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि वन का उपयोग वही व्यक्ति कर सकता है जिसका चरित्र, आचरण और नैतिक जीवन शुद्ध एवं सज्जनतापूर्ण हो।

उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण है। महाकवि भवभूति के अनुसार सृजनशील व्यक्तित्व वही है जिसकी वाणी मधुर हो, व्यवहार विनम्र हो, चरित्र निष्कलंक हो तथा जिसका आचरण भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर एक समान हो। ऐसा व्यक्ति ही समाज तथा प्रकृति के संसाधनों के सदुपयोग का अधिकारी बनता है।

विश्वबंधु ने गुरु-शिष्य संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा कि गुरु का कार्य ज्ञान का संचार करना है, किंतु ज्ञान को किस भाव से ग्रहण करना है, यह पूर्णतः शिष्य की जिज्ञासा, विनम्रता और पात्रता पर निर्भर करता है। यदि विद्यार्थी के भीतर सीखने की सच्ची इच्छा और अंतःकरण की निर्मलता होगी, तभी ज्ञान उसके जीवन में प्रकाश बनकर प्रतिबिंबित होगा।

संस्कृत वाङ्मय और भारतीय ज्ञान-परंपरा पर उन्मुखीकरण व्याख्यान आयोजित

उन्होंने आगे कहा कि ज्ञान स्वयं प्रकाशस्वरूप है। वह केवल सूचना नहीं, बल्कि व्यक्ति के अंतःकरण को आलोकित करने वाली चेतना है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी मौलिक ज्ञान-परंपरा एवं सांस्कृतिक चेतना होती है, जिसके अनुरूप उसके ग्रंथ, दर्शन और जीवन-मूल्य विकसित होते हैं। यूरोपीय दृष्टिकोण राष्ट्र की पहचान को एक भाषा, एक शासन और एक संस्कृति के आधार पर परिभाषित करता है, जबकि भारत की राष्ट्र अवधारणा विविधता में निहित सांस्कृतिक एकात्मता पर आधारित है। भारत अनेक भाषाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बावजूद आत्मचेतना के सूत्र में बंधा हुआ एक जीवंत राष्ट्र है।

उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान के निदेशक डॉ. प्रज्ञेश अग्रवाल ने महाभारत के प्रसंगों के माध्यम से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण पर विचार रखते हुए कहा कि किसी भी छात्र की वास्तविक उन्नति उसकी जिज्ञासा, प्रज्ञा, नैतिक मूल्यों और सतत सीखने की लालसा पर निर्भर करती है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरणा लेकर अपने व्यक्तित्व को ज्ञान, चरित्र और सेवा के आदर्शों से समृद्ध करें।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी एवं प्राध्यापक उपस्थित रहे।


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