सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ दिल्ली: ग्लोबल वार्मिंग से बढ़े समयपूर्व जन्म, भारत में 8,830 मामलों का अनुमान
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी का असर अब गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों के स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगा है। एक नए अध्ययन के अनुसार, अप्रैल 2024 में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पड़ी भीषण गर्मी के दौरान भारत, बांग्लादेश और फिलीपींस में सामान्य परिस्थितियों की तुलना में लगभग 16,150 अतिरिक्त समयपूर्व जन्म हुए। इनमें से करीब 10,600 मामलों को मानवजनित जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है। भारत में ऐसे 8,830 अतिरिक्त जन्मों का अनुमान लगाया गया है।
अंतरराष्ट्रीय शोध समूह जीरो कार्बन एनालिटिक्स (ZCA) के विश्लेषण के मुताबिक, भारत में इस अतिरिक्त बोझ का लगभग दो-तिहाई हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड में केंद्रित रहा। इन राज्यों में अधिक आबादी और गर्मी के संपर्क का स्तर समयपूर्व जन्म के जोखिम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
समयपूर्व जन्म उस स्थिति को कहा जाता है, जब गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले बच्चे का जन्म हो जाता है। ऐसे बच्चों को सांस लेने में परेशानी, संक्रमण और विकास संबंधी जटिलताओं का अधिक खतरा रहता है। अत्यधिक गर्मी गर्भवती महिलाओं के शरीर पर शारीरिक दबाव बढ़ा सकती है। इससे निर्जलीकरण और तनाव जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं, जो समय से पहले प्रसव का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
अध्ययन में भविष्य को लेकर भी चिंता जताई गई है। अनुमान है कि 2041 से 2060 के बीच भारत में सामान्य अप्रैल महीने के दौरान भी जलवायु परिवर्तन के कारण 15,300 तक अतिरिक्त समयपूर्व जन्म हो सकते हैं। यह अनुमान इस धारणा पर आधारित है कि स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु अनुकूलन के स्तर में कोई बड़ा सुधार नहीं होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भवती महिलाओं के लिए समय पर मौसम चेतावनी, पर्याप्त पेयजल, स्वास्थ्य केंद्रों में ठंडक की व्यवस्था और नियमित प्रसवपूर्व देखभाल जरूरी है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए स्वास्थ्य और पर्यावरण नीतियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
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