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दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर जोन में रेल परिचालन को आधुनिक बनाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। जोन के 13 रेलखंडों में अप्रैल से नवंबर 2026 के बीच कुल 110 रूट किलोमीटर पर ऑटोमैटिक सिग्नलिंग प्रणाली शुरू की गई है। रेलवे के अनुसार, यह काम 235 किलोमीटर दोहरी रेल लाइन के बराबर है। इस व्यवस्था से व्यस्त रेलमार्गों पर ट्रेनों की परिचालन क्षमता बढ़ेगी और यात्री व मालगाड़ियों की आवाजाही अधिक सुगम हो सकेगी।

बिलासपुर रेल मंडल के अंतर्गत सक्ती–झाराडीह–खरसिया खंड में 2 नवंबर को शाम 6:30 बजे तथा हर्री–वेंकटनगर–निगौरा खंड में 5 नवंबर को ऑटोमैटिक सिग्नलिंग प्रणाली शुरू की गई। ये दोनों खंड हावड़ा–मुंबई मुख्य रेलमार्ग और बिलासपुर–कटनी रेलमार्ग के महत्वपूर्ण हिस्सों में आते हैं।

सक्ती से खरसिया तक 32 नए सिग्नल

सक्ती–झाराडीह–खरसिया रेलखंड चार लाइनों वाला है और इसकी लंबाई 16 रूट किलोमीटर है। यहां 32 नए ऑटोमैटिक सिग्नल लगाए गए हैं। पूरी व्यवस्था को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम से जोड़ा गया है। इसके अलावा ट्रेनों की स्थिति पर नजर रखने के लिए मल्टी-सेक्शन डिजिटल एक्सल काउंटर के 180 डिटेक्शन पॉइंट स्थापित किए गए हैं।

हर्री–वेंकटनगर–निगौरा में भी आधुनिक व्यवस्था

हर्री–वेंकटनगर–निगौरा खंड में 18 रूट किलोमीटर क्षेत्र में यह प्रणाली शुरू की गई है। तीन रेल लाइनों वाले इस खंड में कुल 40 ऑटोमैटिक सिग्नल लगाए गए हैं। इसके साथ तीनों स्टेशनों के यार्ड में 24 सेमी-ऑटोमैटिक सिग्नल स्थापित किए गए हैं। ट्रेनों की निगरानी के लिए 172 डिटेक्शन पॉइंट और 197 ट्रैक सेक्शन बनाए गए हैं।

एक ही रेलखंड पर चल सकेंगी कई ट्रेनें

पारंपरिक सिग्नलिंग व्यवस्था में दो स्टेशनों के बीच अगली ट्रेन को पहली ट्रेन के अगले स्टेशन पहुंचने तक इंतजार करना पड़ता है। ऑटोमैटिक सिग्नलिंग में रेलखंड को छोटे हिस्सों में बांटकर सिग्नल लगाए जाते हैं। इससे एक ही रेलखंड पर सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए कई ट्रेनें एक के बाद एक चलाई जा सकती हैं।

इससे ट्रेनों के अनावश्यक ठहराव में कमी, समयपालन में सुधार और रेलमार्ग की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। कोयला, इस्पात, सीमेंट और बिजली उद्योगों से जुड़ी मालगाड़ियों को भी इसका लाभ मिलेगा। रेलवे के मुताबिक, बढ़ी हुई क्षमता से भविष्य में नई ट्रेनें चलाने और अतिरिक्त फेरे शुरू करने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी।


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