सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ भोपाल: यूपी में हिंसा करने वालों को सरकारी नौकरी नहीं, नई भर्ती नीति पर SP-BJP आमने-सामने

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी के लिए चरित्र सत्यापन के नए नियमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी आमने-सामने आ गई हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार की नई भर्ती नीति के तहत हिंसक गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है। वहीं, समाजवादी पार्टी ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे विरोध प्रदर्शनों और लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने वाला कदम बताया है।

क्या कहती है नई भर्ती नीति? राज्य सरकार ने सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों, स्वायत्त संस्थाओं, पंचायतों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती के लिए चरित्र एवं पूर्ववृत्त सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत हत्या, दुष्कर्म, दहेज हत्या, गंभीर हिंसक अपराध, पेपर लीक, नकल गिरोह और साइबर ठगी जैसे मामलों में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर अभ्यर्थियों को नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जा सकता है।

नीति में हिंसक तरीकों से व्यवस्था बदलने की गतिविधियों में शामिल होने के मामलों का भी उल्लेख है। हालांकि, केवल किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने या सरकार बदलने की मांग करने से किसी अभ्यर्थी को नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ एफआईआर दर्ज होने या जांच लंबित रहने से भी स्वतः अयोग्यता लागू नहीं होगी।

सपा ने उठाए लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल समाजवादी पार्टी ने नई नीति पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ आवाज उठाना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है। पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया कि ऐसे नियमों का इस्तेमाल विरोध करने वाले युवाओं को डराने के लिए किया जा सकता है। विपक्ष का कहना है कि सरकार बदलने की मांग अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि नहीं है। किसी अभ्यर्थी की पात्रता तय करते समय उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों और वास्तविक परिस्थितियों के बीच अंतर किया जाना चाहिए।

भाजपा सरकार का पक्ष और सत्यापन की समयसीमा सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का उद्देश्य चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना और नियुक्तियों में अनावश्यक देरी रोकना बताया गया है। सामान्य पदों के लिए सत्यापन पूरा होने से पहले प्रोविजनल नियुक्ति दी जा सकती है, जबकि संवेदनशील पदों पर विस्तृत जांच जरूरी होगी। पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई को सत्यापन रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर देनी होगी।

यदि सत्यापन में प्रतिकूल जानकारी सामने आती है, तो संबंधित अभ्यर्थी को अपना पक्ष रखने का अवसर देने का प्रावधान भी है। गलत जानकारी देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने पर नियुक्ति रद्द की जा सकती है और नियमानुसार कार्रवाई हो सकती है। नई नीति पर विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि गंभीर हिंसक गतिविधियों पर रोक और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस जारी है।


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