सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : क़व्वाली की सम्मोहक लय और धुनें ईश्वर, प्रेम और संगीत को एक रूप में बांधती हैं। वास्तव में यह दक्षिण एशिया में सूफ़ी परम्परा की भौतिक और संगीतमय आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। क़व्वाली दरअसल सूफ़ियों का भजन-कीर्तन है। क़व्वाली का उद्देश्य अपने श्रोताओं के आध्यात्मिक आनन्द की अलौकिक अनुभूति पैदा करना है।
ये बात आज निज़ामी सुल्तान जी ब्रदर्स की प्रस्तुति में कही गई। स्पिक मैके भोपाल चैप्टर द्वारा आयोजित निज़ामुद्दीन दरगाह, दिल्ली के अज़ीम क़व्वाल निज़ामी सुल्तान जी ब्रदर्स की क़व्वाली का आयोजन शासकीय मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल, टी. टी. नगर और पीपुल्स यूनिवर्सिटी, भानपुर में किया गया।
जो डूबा सो पार,
क़व्वाल बन्धु आज़म निज़ामी और नाज़िम निज़ामी ने सबसे पहले अल्ला हू से शुरुआत की। उसके बाद अलग-अलग कलाम पेश किए। निज़ामी भाइयों ने विद्यार्थियों से बात करते हुए कहा कि सूफ़ी परमात्मा को अपना मेहबूब मानते हैं। निराकार ईश्वर ही सूफ़ियों का सबसे ख़ास माशूक़ और विश्वासपात्र है जिसकी मोहब्बत में वे हर वक़्त बेचैन रहते हैं। उन्होंने बताया कि सांसारिक प्रेम को वो अपने प्रेमी यानी परमात्मा तक पहुँचने का माध्यम मानते हैं। सूफ़ी दर्शन को आसानी से बयां करता शेर है:
ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार
उसके बाद छात्रों की माँग पर उन्होंने भर दो झोली, छाप तिलक सब छीनी, दमादम मस्त कलंदर आदि सुनाए जिन पर छात्रों ने बहुत आनन्द लिया। पीपुल्स यूनिवर्सिटी में दमादम मस्त कलन्दर और मेरे रश्के क़मर पर विद्यार्थी और फ़ैकल्टी दोनों जम कर नाचे। पीपुल्स यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम का समापन उन्होंने हज़रत अमीर ख़ुसरो के कालजयी कलाम ‘आज रंग है ए माँ रंग है री’ से किया। आज़म निज़ामी ने बताया कि निज़ामियों में ये नियम है कि इस कलाम को बहुत सम्मान और समर्पण से गया जाता है और इसकी बाद कोई और क़व्वाली नहीं गाई जाती। आज रंग गाने के लिए दोनों भाइयों ने सम्मान स्वरूप टोपी भी पहनी।
कार्यक्रम में मॉडल स्कूल की आर्चरी रेखा शर्मा, उप प्राचार्य आर. के. श्रीवास्तव, पीपुल्स यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर हरीश राव, रजिस्ट्रार नीरजा मलिक, स्पिक मैके के पदाधिकारी सहित संकाय सदस्य और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।