सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर के शोध केंद्र तथा साहित्य विधा शाखा एवं भारतीय भाषा विद्या शाखा द्वारा आयोजित राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों का उद्घाटन हुआ।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के माननीय कुलपति प्रो श्रीनिवास वारखेड़ी के संरक्षण में आयोजित ‘भारतीय तथा पाश्चात्य काव्य शास्त्रीय एवं नाढ्य शास्त्रीय परंपरा’ पर आधारित साहित्य विधा शाखा की राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं ‘संस्कृत वांग्मय का हिंदी साहित्य पर प्रभाव’ विषय पर आधारित भारतीय भाषा विद्या शाखा की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में बस्ती उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो अष्टभुजा शुक्ल उपस्थित रहे।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल परिसर के निदेशक रमाकांत पांडेय ने की। उद्घाटन सत्र के प्रारंभ में साहित्य संगोष्ठी के संयोजक प्रो संनदन कुमार त्रिपाठी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए उनके महत्वपूर्ण कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने साहित्य विधा शाखा की संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की एवं बताया कि भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय एवं नाट्यशास्त्रीय परंपराओं में एकरूपता के अनेक बिंदु पाए जाते हैं। प्रस्तुत संगोष्ठी में शोधकर्ता इन दोनों ही धाराओं के बिंदुओं पर आधारित काव्य शास्त्रीय व नाट्य शास्त्रीय प्रयोगों पर शोध प्रस्तुत करेंगे। भारतीय भाषा विद्या शाखा की संगोष्ठी की समन्वयिका प्रोफेसर अर्चना दुबे ने हिंदी साहित्य पर संस्कृत वाङ्मय के प्रभाव पर बात करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल परिसर के निदेशक रमाकांत पांडेय ने कहा कि इन संगोष्ठियों का विषय अत्यंत ही व्यापक है जिन्हें इतने कम समय में समेटना असंभव है, परन्तु उद्देश्य है कि कुछ ज्वलंत विचार उत्पन्न होंगे जो आगे शोध का पथ प्रशस्त करेंगे। उन्होंने कहा कि संस्कृत को भी क्षेत्रीय बोलियों ने आगे बढ़ाया है। भाषाओं का आदान-प्रदान सभ्यता को विकसित करता है।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय संबंधों पर चर्चा करते हुए भरत मुनि के द्वारा प्रतिपादित बनुकृति व्यापार से अरस्तू के अनुकृति सिद्धांत की तुलना प्रस्तुत की। बरस्तू के कैथार्सिस की तुलना में भरत मुनि का रस सिद्धांत अधिक सकारात्मक सोच रखता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो अष्टभुजा शुक्ल ने संवाद स्वरूप में बात करते हुए कहा कि संस्कृत वाद्मय में जीवन के सारे क्षेत्र समाहित हैं। संस्कृत अनुवाद के अलावा इसके अन्य प्रभाव भी हिन्दी में देखने को मिलते हैं। संस्कृत तथा हिन्दी में बादरायण संबंध बनता है।
इसी अवसर पर गोकुल जन कल्याण समिति भोपाल द्वारा आचार्य श्री गोकुल प्रसाद त्रिपाठी की स्मृति में प्रत्येक वर्ष दिए जाने वाला पूर्ण सरस्वती सम्मान, आचार्य दुर्गा प्रसाद शुक्ल एवं आचार्य गोकुल प्रसाद त्रिपाठी संस्कृत सम्मान श्री पियवत मिश्र को प्रदान किया गया। उद्घाटन सत्र में धन्यवाद ज्ञापन भारतीय भाषा विद्या शाखा के सुभाष चन्द्र ने किया तथा इस सत्र का संचालन डॉ आयुष दीक्षित ने किया।