सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल: विगत 10 दिनों से केंदीय सस्कृत विश्वविद्‌यालय ओपाल परिसर में चल रही भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय कार्यशाला समारोह पूर्वक संपन्न हुई। समापन सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्‌यालय नई दिल्ली के कुलपति श्रीनिवास बरखेड़ी अध्यक्ष, सुप्रसिद्ध अभिनेता राजीव वर्मा मुख्य अतिथि, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के पूर्व कुलपति, प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी सारस्वत अतिथि तथा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली की निदेशक पूजा व्यास विशिष्ट अतिथि थी कार्यशाला का प्रतिवेदन सुज्ञान कुमार मोहंती ने प्रस्तुत किया, इस अवसर पर प्रतिभागियों ने अपने अनुभव कथन भी किए।

समापन सत्र में स्वागत वक्तव्य देते हुए केंद्रीय संस्कृत विश्ववि‌द्यालय, भोपाल परिसर के निर्देशक रमाकांत पांडे ने सभी अतिथियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि नाट्यशास्त्र अद्‌भुत ग्रथ है जिसका संबंध सिर्फ नाट्य कला ही नहीं अपितु साहित्य के प्रत्येक पक्ष से है। इस कार्यशाला में पूरे राष्ट्र से विभिन्न विदांन पधारे थे जिन्होंने नृत्य, अभिनय काला व साहित्य के विभिन्न पक्षी पर समस्त प्रतिभागियों को व्यावहारिक प्रयोग का प्रदर्शन करते हुए प्रशिक्षण दिया। श्रीनिवास बरखेड़ी ने अपने अध्यक्षीय उद्‌बोधन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्‌यालय दद्वारा सस्कृत भाषा साहित्य व समस्त शास्त्रों के समसामयिक शोध तथा विश्लेषण की बात कही।

उनका कहना था कि केंद्रीय सस्कृत विश्वविद्‌यालय भारतीय परपरा व सरकृति की अवधारणा को जीवत रखते हुए आधुनिक समय के अनुसार शास्त्री के अध्ययन विश्लेषण पर कार्य कर रहा है। हम नाट्यशास्त्र के सिद‌धातो को प्रयोग करते हुए आगे लेके जाना होगा एवं माट्‌यशास्त्र विभाग को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति कीउपलब्धियों तक पहुंचना है। राधावल्लभ त्रिपाठी ने नाट्यशास्त्र को आधुनिक रंगमंच में प्रयोग करते हुए नाट्य कला अपनाए जाने की बात कही। प्रसि‌द्ध अभिनेता और रंगकर्मी राजीव वर्मा ने नृत्य अभिनय के सह संबंध को बताते हुए कहा कि भाव प्रवणता दोनों ही कलाओं का मुख्य कौशल है।

कलाकार को भावों की अभिव्यक्ति में जीवंतता व सटीकता लाने के लिए कथानक में भीतर तक डूब कर प्रदर्शन करना होता है । पूजा व्यास ने भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के मुख्य कार्यों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि भारतीय दर्शन प्रमुखतः संस्कृत शास्त्रों में वर्णित दर्शन के विभिन्न आयाम अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं ।इन पर शोध करते हुए वर्तमान समय अनुसार उनकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया जाना चाहिए। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रो सनंदन त्रिपाठी ने किया कार्यक्रम का संचालन श्रीमती कल्याणी फगरे ने किया।