आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मैं कलम से नहीं,

दिल से लिखता हूं,

धुन में लफ्ज नहीं,

अहसास भरता हूं।

गीतकार इरशाद कामिल का यह शायराना जवाब उस सवाल के जवाब में है, जब उनसे पूछा गया कि आपके गीत लोगों की जुबां पर रहते हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरी कोशिश होती है कि मेरे लिखे गीत लोगों के दिल तक पहुंचें, उन्हें पसंद आ सकें। मैं कलम से नहीं, दिल से लिखता हूं…। ‘

इरशाद कामिल बॉलीवुड मूवी ‘जीरो’, ‘सुल्तान’, ‘रॉकस्टार’ जैसी कई फिल्मों के लिए सुपरहिट गाने लिखे हैं। वे यूथ्स के दिल की आवाज को शब्द देते हैं। वे रविवार रात भोपाल में खोजी पत्रकार राजकुमार केसवानी की स्मृति में हुए पहले सम्मान समारोह ‘आपस की बात’ में शामिल हुए।

दैनिक भास्कर से बातचीत में इरशाद कामिल ने बताया कि अपकमिंग फिल्म ‘इक्कीस’ ‘छाबा’ और ‘चमकीला’ के लिए भी उन्होंने गाने लिखे हैं।

पहले जैसे गाने आजकल क्यों नहीं लिखे जाते? इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘आज आप ओल्ड सॉन्ग में से सिलेक्टेड गाने सुनते हैं। हालांकि, गाने बहुत सारे हैं। अगर मेहनत कर सुनेंगे तो मजा आएगा। इसी तरह आज के गानों में से भी अगले 25-50 सालों में सिलेक्टेड गाने सुने जाएंगे। तब भी लोग यही कहेंगे, जो आज आप कह रहे हैं।’

भाषाओं को बांटना गलत, हिंदी मेरी मां, उर्दू माशूका…

‘मैं पंजाब से हूं। पंजाबी भी मेरी भाषा है। पढ़ाई करते समय हिंदी भी मेरी भाषा रही। परिवार में उर्दू का भी चलन था। तीनों मेरी भाषाएं हैं।’ उन्होंने कहा, ‘भाषा को डिवाइड करना ठीक नहीं है। बहुत गलत है। यह तो बिल्कुल ऐसी हैं, जैसे हिंदी मेरी मां तो उर्दू मेरी माशूका…।’

लेखन की दुनिया में कदम रखने वालों के लिए संदेश

इरशाद कामिल ने कहा कि जो गीतकार बनना चाहते हैं, वे बन जाएं, क्योंकि बनकर ही कुछ होता है। सोच पहली चीज होती है, दूसरी चीज है क्रिया यानी एक्शन। हर युवा से कहूंगा कि पहले बनो। बस वह पहले बनें।

साझा किए राजकुमार केसवानी के यादगार लम्हे…

इरशाद कामिल ने पत्रकार राजकुमार केसवानी की 73वीं जन्मतिथि पर उनको याद करते हुए किस्सा सुनाया, जो ये है…

एक कमरा है, कमरे में अंधेरा है और एक तिकोना सा टेबल है। टेबल के ऊपर लैंप जल रहा है और वहां कोई बैठा है। वह शख्स खिड़की से बाहर देख रहा है और कुछ सोच रहा है। एक वक्त के बाद फोन बजता है और वो अपने ध्यान में मगन फोन उठा लेता है, बिना देखे और सोचे की किसका होगा।

हेलो… क्या कर रहे हो? सोच रहा हूं। सोचना क्या होता है। किसी के पास जवाब नहीं है। ये कोई मैं हूं और सवाल करने वाले राजकुमार केसवानी साहब हैं। मैंने कहा- कभी सोचा नहीं कि सोचना क्या होता है। वे बोले- फिर तुम लेखक कैसे बन गए? मैंने कहा- कभी ये भी नहीं सोचा कि लेखक क्या होता है? वे बोले- तो फिर लिखने क्यों लगे। मैंने कहा- दिल किया।

इरशाद ने आगे सुनाया…

दिल्ली के कार्यक्रम में केसवानी जी जब मिले तो चाय पीते-पीते हमारी दोस्ती हो गई। तब मैं कॉलेज से निकलकर नज्में और कविताएं लिखते हुए अपना स्थान बनाना चाह रहा था। मुझे उन्होंने कहा- इरशाद अपनी नज्म मुझे भेजें, मैं छापता हूं। बाद में मेरी किताब ‘एक महीना नज्मों का’ छपी तो भोपाल और इंदौर में भी इससे जुड़े कार्यक्रम हुए। वो मेरे लिए यादगार लम्हों में से एक है, जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता।

रूमी जाफरी और एक्टर राजीव भी शामिल हुए

किस्सों के सिलसिले में लेखक और निर्देशक रूमी जाफरी और अभिनेता राजीव वर्मा ने भी कामिल का साथ दिया। कार्यक्रम में राजकुमार केसवानी के प्रति लगाव ऐसा कि उनके बचपन के दोस्त से लेकर 90 साल के बुजुर्गों ने भी शिरकत की। कार्यक्रम में विजयदत्त श्रीधर ने स्वागत उद्बोधन भी दिया। कार्यक्रम में दिल्ली की पत्रकारिता शिक्षिका, मीडियाकर्मी और जेल सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली डॉ. वर्तिका नंदा को पहला राजकुमार केसवानी पुरस्कार दिया गया।