सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : हम सभी के भीतर एक तत्व है जो एक मौन दृष्टा या पर्यवेक्षक है। यह जो स्थिरता की अवस्था है वही शिव तत्व है। प्रकृति हर क्षण कई चीजों को जन्म देती है। वह सृजनकर्ता है। वह अपने स्वरूप में शक्ति है। शिव और शक्ति के योग के लिए स्थिरता आवश्यक है । अगर हमें अपने किसी भी एक्शन में उत्कृष्टता चाहिए तो उसके लिए स्थिरता होना बहुत जरूरी है। इस तरह परफैक्शन शिव और शक्ति का योग है। हमारे हर कार्य, करियर और पूरे जीवन के लिए इस योग का होना आवश्यक है। यह बात आज एमसीयू में विद्यार्थियों से संवाद करते हुए प्रख्यात लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर कार्तिकेय वाजपेयी ने कही। अपनी पुस्तक द अनबिकमिंग पर चर्चा करते हुए वाजपेयी ने बताया कि यह एक ऐसे क्रिकेटर और उसके कोच की कहानी है जो परफेक्शन की खोज में हैं।

उन्होंने कहा कि बुद्धि और विवेक दोनों ही अलग-अलग चीजें हैं। हम बुद्धि के साथ ही जन्म लेते हैं। यह हमारे भीतर की संज्ञानात्मक क्षमता है। लेकिन विवेक इससे बिल्कुल भिन्न है। इसे पाने के लिए हमें साधक होना पड़ता है। हमारे जीवन के उद्देश्य का सीधा और गहरा संबंध इससे है। हमें सोचना चाहिए कि अपने जीवन का उद्देश्य हम खोजते हैं या जब हम पूरी तरह तैयार हो जाते हैं तो जीवन का उद्देश्य हमें खोज लेता है।वर्तमान समय बहुत ही अप्रत्याशित सा है। हम किसी अज्ञात विचार से चिंतित होते हुए मौजूदा समय में नहीं रह पाते। अक्सर हम वर्तमान समय को भूतकाल या भविष्य के साथ तुलना करते हुए देखते हैं। लेकिन अगर मौजूदा समय को पुराने वक्त के हिसाब से देखेंगे तो हमें दुख होगा और भविष्य की दृष्टि से देखेंगे तो यह एक तरह की भूख या लालसा को जन्म देगा। इसके चलते हुए हम कभी भी मौजूदा वक्त में नहीं ध्यान एकत्र कर पाते हैं। विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वाजपेयी ने विद्यार्थियों को सफल जीवन और करियर के लिए कई टिप्स दिए।

घटनाओं को अनुभव करते हुए वर्तमान में रहें

विद्यार्थियों से चर्चा करते हुए कार्तिकेय ने कहा कि वर्तमान में रहते हुए भी उससे जुड़ नहीं पाने की समस्या अटेंशन स्पैन कम होने या एकाग्रता के अभाव में होती है। दरअसल हम हमारे अटेंशन स्पैन को बढ़ाने के लिए अनुभव में गहरे तक उतरना होगा। जब हम गहराई से घटनाओं को अनुभव करते हैं तो वहां कोई विचार नहीं होता। हम हमारे अनुभव करने की क्षमता से जीवन के उद्देश्य की तरफ बेहतर ढंग से बढ़ सकते हैं।

मौलिकता होना जरूरी उन्होंने कहा कि हमारी मौलिकता हमारे जीवन के उद्देश्य से हमें बेहतर तरीके से जोड़ती है। हम अक्सर वैसा बनने की कोशिश में रहते हैं जैसा हमें दूसरे चाहते हैं। होना यह चाहिए कि हम खुद को कैसा देखना चाहते हैं। वह हमारा खुद के बारे में मौलिक विचार होता है। आज के समय में डिजिटल एल्गोरिथम ने हमारे जीवन की वास्तविकता से हमें थोड़ा अलग कर दिया है। अगर हमारे भीतर खुद के बारे में भी कोई विचार डिजिटल एल्गोरिथम से आ रहा है तो हम वास्तविकता से दूर ही रहेंगे। इसलिए बेहतर है कि हम खुद से खुद के बारे में पूछें और स्वयं को समय दें। तभी हम चीजों में मौलिक रह सकेंगे।

सृजनात्मकता के लिए अनुभव करना जरूरी वाजपेयी ने कहा कि जीवन को अनुभव करने से हम सृजनात्मक हो सकते हैं। आज के मौजूदा वक्त में समसामयिक या प्रासंगिक बने रहना बहुत जरूरी है। जब हमारे भीतर साहस आ जाएगा कि हम खुद को अपने वास्तविक रूप में व्यक्त कर पा रहे हैं तभी हम खुद के प्रति सबसे ईमानदार व्यक्ति होंगे।

एकाग्रता ही बेहतर करने की कुंजी उन्होंने कहा कि हमारी इंद्रियां बाहर की दुनिया से संवाद के लिए बनी हुई होती हैं। ये हमें बाहरी चीजों के बारे में जागरूक करती हैं। लेकिन जब हमें इन्हें स्थिर कर देते हैं तो हमारे भीतर एक तरह की सहजता खिल उठती है। इसे कृष्ण चेतना या कृष्णा तत्व भी कह सकते हैं। हमारे भीतर खुद को अलग करने की एक समर्थ या शक्ति होती है। अगर हम भूतकाल की दृष्टि से मौजूदा समय को देखेंगे तो हमें भय लगेगा और अगर हम भविष्य की नजर से इसे देखेंगे तो हमारे भीतर एक तृष्णा उत्पन्न होगी। ऐसे में भय और तृष्णा से दूर रहकर अगर हम अपने वास्तविक मौजूदा समय में रहेंगे तभी हम एकाग्र होकर कुछ भी बेहतर कर सकते हैं।

अटेंशन दुनिया का सबसे बड़ा जादू कार्तिकेय वाजपेयी ने बताया कि आज के वक्त में हर कोई चाहता है कि उसे दूसरे अटेंशन दें। कोई वक्ता हो तो वह चाहता है कि लोग उसे ध्यान से सुनें। लेकिन अगर हमें दूसरों का अटेंशन नहीं मिल पाता है तो हम परेशान हो जाते हैं। इसके लिए हमें सहज होना पड़ेगा। चीजों को बनाकर पेश करने के बजाय उन्हें वास्तविकता में प्रस्तुत करना आवश्यक है। मन में आने वाले विचारों को रोक पाना कठिन है। ये विचार एक तरह का लूप तैयार करते हैं। इसमें हमारी इंद्रियां हमें उलझाए रखती हैं। अध्ययन बताते हैं कि एक इंसान को औसतन एक दिन में लगभग 55 हजार विचार आते हैं। इसमें से महज 150 विचारों को ही हम अनुभव कर पाते हैं। इसलिए ध्यान केंद्रित कर अगर हम कोई काम करते हैं तो वह बेहतर हो सकता है।

हम किसी महत्वपूर्ण काम को करते वक्त दूसरों की अपेक्षाओं के दबाव को कैसे कम करें यह सवाल पूछे जाने पर वाजपेई ने कहा कि अपनी धारणाओं को हम बहुत सुरक्षित रखना चाहते हैं। हम उन चीजों को बहुत महत्व देते हैं जिन्हें हम जानते हें। अप्रत्याशित के डर से ऐसा होता है। हम सभी के साथ ऐसा होता है। इससे हमें बाहर आकर ही कुछ अच्छा किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि खुद की आइडेंटिटी में अगर हम स्वयं को बांधे रखेंगे तो छोटी-छोटी बातें हमें परेशान करेंगी।

जीवन का लक्ष्य खुद को पहचानना वाजपेयी ने कहा कि वास्तव में देखें तो जीवन का सबसे अंतिम और उच्च उद्देश्य अपने आप को जानना है। अगर डिजिटल एल्गोरिथम में हम खुद को खोज रहे हैं तो यह सही नहीं है। आप खुद ही स्वयं लिए अच्छा साथी बनें। जीवन वास्तव में देखें तो खुद को खोजने की एक यात्रा है। अगर आप अपने किसी भी काम से एकाग्रता से जुड़ जाते हैं और दूसरी चीजों से विरक्त हो सकते हैं तो ही हम अपने हर लक्ष्य को पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि सृजनात्मकता सहजता से आती है। विद्यार्थियों के प्रश्नोत्तर में उन्होंने कहा कि हम समय की महत्ता को कैसे अनुभव करते हैं यह भी लक्ष्यों की तरफ बढ़ने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि विद्यार्थियों के जीवन का अंतिम लक्ष्य सिर्फ डिग्री लेना नहीं होना चाहिए। औपचारिक तौर पर शिक्षा लेने के अलावा भी विद्यार्थी कई क्षेत्रों में बहुत बेहतर कार्य कर सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को लेखन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम में आभार प्रदर्शन विभागाध्यक्ष पवित्र श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर ने किया। इस अवसर पर विभाग के समस्त विद्यार्थी एवं शिक्षक उपस्थित थे।


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