सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ भोपाल: सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ / एजेंसियां, भोपाल: ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय ने अटलांटिक पार गुलामों के व्यापार के इतिहास को शर्मनाक अध्याय बताते हुए गहरा दुख और पीड़ा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस इतिहास को याद करने से उनका मन भय और आत्मा गहरे दुख से भर जाती है। किंग चार्ल्स ने यह बात 3 नवंबर को एंटीगुआ और बारबुडा में आयोजित राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक (CHOGM) के उद्घाटन समारोह में कही। उनके बयान के बीच कैरिबियाई देशों की ओर से ब्रिटेन से औपचारिक माफी और मुआवजे की मांग फिर तेज हो गई है।
किंग ने अपने संबोधन में कहा कि अतीत में हुई घटनाओं को बदला नहीं जा सकता, लेकिन उनसे सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि गुलामी का इतिहास आज भी कैरिबियाई द्वीपों और राष्ट्रमंडल के कई देशों पर अपनी छाया डाल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय को सुनने, समझने और इतिहास का अध्ययन करने के बाद अतीत की गलतियों को दूर करने के लिए आधुनिक साझेदारी बनाने की उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत हुई है।
माफी और मुआवजे की मांग पर क्या बोले देश कैरिबियाई देशों और गुलामी विरोधी अभियान से जुड़े संगठनों का कहना है कि ब्रिटेन को अपने ऐतिहासिक योगदान की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए औपचारिक माफी मांगनी चाहिए और प्रभावित देशों को मुआवजा देना चाहिए। उनका तर्क है कि गुलामी और औपनिवेशिक शासन के प्रभाव आज भी आर्थिक और सामाजिक असमानताओं के रूप में दिखाई देते हैं।
एंटीगुआ और बारबुडा में बैठक के दौरान प्रदर्शनकारियों ने भी जवाबदेही और सुधारात्मक न्याय की मांग उठाई। हालांकि, किंग चार्ल्स ने अपने भाषण में न तो औपचारिक माफी मांगी और न ही मुआवजे का समर्थन किया। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, राष्ट्रमंडल देशों के बीच व्यापार और जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहयोग को भविष्य की दिशा बताया।
ब्रिटिश सरकार भी बातचीत के लिए तैयार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने हाल में कहा था कि वह गुलामी के इतिहास पर औपचारिक माफी की मांग को लेकर बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन आर्थिक मुआवजे को उचित समाधान नहीं मानते। ऐसे में राष्ट्रमंडल की यह बैठक ब्रिटेन और कैरिबियाई देशों के बीच ऐतिहासिक जिम्मेदारी, माफी और सुधारात्मक न्याय पर चर्चा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है।
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