सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर जारी आंदोलन के बीच विश्वविद्यालय के संस्थापक परिवारों के सदस्यों, पूर्व छात्रों और छात्र संगठनों ने प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन किया है। 26 अक्टूबर को दिल्ली में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली, परिसर में सुरक्षा व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित कार्रवाई पर सवाल उठाए। छात्र प्रतिनिधियों ने परिसर की स्थिति को “जेल जैसा” बताते हुए प्रशासन से बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की मांग की।

संस्थापक परिवारों ने छात्रों का किया समर्थन प्रेस कॉन्फ्रेंस में सईदा हमीद और सिद्दीकुर रहमान किदवई सहित विश्वविद्यालय के संस्थापक परिवारों के सदस्यों ने छात्रसंघ की बहाली की मांग का समर्थन किया। सईदा हमीद ने जामिया के संस्थापकों के शैक्षणिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि छात्र विश्वविद्यालय की उस परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें युवाओं की भागीदारी और शिक्षा को महत्व दिया गया था। सिद्दीकुर रहमान किदवई ने छात्रसंघ को स्वतंत्र भारत में विश्वविद्यालयों के लिए जरूरी बताते हुए छात्रों की मांगों पर विचार करने की अपील की। पूर्व छात्रा समीना मिश्रा ने भी कहा कि मौजूदा विवाद का समाधान संवाद और छात्रों की बात सुनने से निकल सकता है।

प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की प्रतिनिधि सनम ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान परिसर में बिजली-पानी की उपलब्धता, टेंट हटाने और गेटों को बंद करने जैसी कार्रवाइयों से छात्रों की मुश्किलें बढ़ीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों की निजी जानकारी साझा किए जाने के कारण पुलिस उनके घरों तक पहुंच रही है। ये आरोप छात्र प्रतिनिधियों ने लगाए हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्यों के रूप में नहीं माना जा सकता।

चुनाव की समयसीमा पर विवाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने 26 अक्टूबर को आदेश जारी कर कहा था कि छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिन बाद चुनाव कराए जाएंगे। प्रशासन ने प्रदर्शन के दौरान जारी निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा सुरक्षा कर्मियों की भूमिका की जांच के लिए समिति बनाने की बात भी कही थी। हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों ने इस व्यवस्था को अपर्याप्त बताया। उनका कहना है कि संविधान को मंजूरी देने की तारीख स्पष्ट नहीं होने से चुनाव की निश्चित समयसीमा तय नहीं होती। ऐसे में छात्रसंघ की बहाली और प्रशासन के साथ बातचीत इस विवाद के प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।


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