सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : रोपड़। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रोपड़ ने पीएचडी की पढ़ाई के लिए एक नया मॉडल शुरू किया है। इसके तहत शोधार्थी पारंपरिक लिखित थीसिस के बजाय अपने शोध के व्यावहारिक परिणामों के आधार पर डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर सकते हैं। संस्थान ने इसे प्रोडक्ट/स्टार्टअप-ड्रिवन पीएचडी नाम दिया है। इस व्यवस्था में किसी उपयोगी उत्पाद का विकास, पेटेंट हासिल करना, तकनीक का व्यावसायिक हस्तांतरण या स्टार्टअप खड़ा करना शोध का प्रमुख परिणाम बन सकता है।
संस्थान के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य अकादमिक शोध को वास्तविक समस्याओं के समाधान, तकनीकी नवाचार और उद्योग की जरूरतों से जोड़ना है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पीएचडी बिना शोध या मूल्यांकन के मिल जाएगी। शोधार्थियों को निर्धारित अकादमिक मानकों और संस्थान के पीएचडी नियमों के अनुरूप अपने काम के परिणाम प्रस्तुत करने होंगे।
थीसिस की जगह प्रोडक्ट और नवाचार पर जोर IIT रोपड़ के निदेशक प्रो. राजीव आहूजा के अनुसार, इस मॉडल में शोधार्थी को पारंपरिक पीएचडी थीसिस लिखने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके बजाय वह किसी उत्पाद को विकसित करने, स्टार्टअप शुरू करने या पेटेंट हासिल करने पर काम कर सकता है। इन परिणामों के आधार पर उसके शोध का मूल्यांकन किया जाएगा।
तीन रास्तों से आगे बढ़ेगा शोध इस मॉडल में शोधार्थियों के लिए नवाचार को आगे बढ़ाने के तीन प्रमुख रास्ते हैं। पहला, किसी नई तकनीक या आविष्कार का पेटेंट हासिल करना। दूसरा, उत्पाद तैयार करके स्टार्टअप के माध्यम से उसे बाजार तक पहुंचाना। तीसरा, विकसित तकनीक को किसी मौजूदा कंपनी को हस्तांतरित करना, ताकि उसका व्यावसायिक उपयोग हो सके।
स्टार्टअप को मिलेगा संस्थान का सहयोग IIT रोपड़ का नवाचार तंत्र विद्यार्थियों और शिक्षकों को शुरुआती विचार से प्रोटोटाइप तैयार करने तक सहायता देने पर केंद्रित है। संस्थान का इन्क्यूबेशन तंत्र तकनीकी सुविधाएं, मार्गदर्शन और निवेशकों से संपर्क के अवसर उपलब्ध कराता है। इससे शोधार्थियों को अपने विचारों को वास्तविक उत्पाद और व्यावसायिक समाधान में बदलने में मदद मिल सकती है।
शोध के मूल्यांकन का बदलता नजरिया पारंपरिक पीएचडी में शोध-प्रबंध और अकादमिक प्रकाशनों की अहम भूमिका होती है। नए मॉडल में व्यावहारिक परिणामों को अधिक महत्व दिया जाएगा। इससे तकनीक, उद्योग और समाज के लिए उपयोगी समाधान विकसित करने के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उत्पादों और स्टार्टअप के मूल्यांकन में वैज्ञानिक गुणवत्ता, मौलिकता और अकादमिक कठोरता किस तरह सुनिश्चित की जाती है।
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