आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने मप्र के इतिहास में वोट पर्सेंट के लिहाज से सबसे बड़ी जीत और सीट के लिहाज से दूसरी सबसे बड़ी जीत हासिल की है। ये तब हुआ है, जब 6 महीने पहले हवा पार्टी के खिलाफ बहती लग रही थी।
तमाम सर्वे और मीडिया रिपोर्ट्स में कांग्रेस की सरकार बनने का दावा किया जा रहा था। इससे ऐसा माहौल बन गया था कि इस बार बीजेपी के लिए कांग्रेस बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। फिर ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल कर ली। दो बातें अहम हैं- पहली- पर्दे के पीछे बीजेपी की जीत तय करने वाले रणनीतिकार और दूसरी- उनके काम करने का तरीका और स्ट्रैटजी। बीजेपी की जीत की इनसाइड स्टोरी-
केंद्रीय मंत्रियों के साथ संगठन महामंत्री की केमिस्ट्री ने बिगाड़ा कांग्रेस का गणित
मप्र में पीएम नरेंद्र मोदी ने फ्रंटलाइन पर आकर दौरे और सभाएं की। गृहमंत्री अमित शाह खुद डे-टू-डे मॉनिटरिंग कर रहे थे। इन सबके बीच तीन लोग ऐसे थे जो चुपचाप अपने काम में लगे थे। ये हैं केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा। दोनों केंद्रीय मंत्रियों के साथ संगठन महामंत्री की कामकाजी रणनीति और बिना सामने आए काम करना अहम रहा।
बीजेपी ने चुनाव की शुरुआत गृहमंत्री अमित शाह को अभियान की कमान सौंपकर की। उनके साथ केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को प्रदेश चुनाव प्रभारी और टेक्नोलॉजी के एक्सपर्ट केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को सह प्रभारी बनाकर मध्य प्रदेश भेजा गया। वहीं संगठन की ओर से संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा प्रदेश में बिल्कुल जमीनी स्तर तक पार्टी को मजबूत करने के काम में लगे थे।
हितानंद की रणनीति को अमल में लाने की क्षमता, डाटा और एनालिसिस का एक्सपर्टाइजेशन, प्रदेश-संगठन की सटीक जानकारी और संगठन क्षमता का भी पार्टी को पूरा फायदा मिला। वे सोशल मीडिया के भी एक्सपर्ट माने जाते हैं। इसलिए संगठन ने उनके एक्सपर्टाइजेशन का भरपूर फायदा उठाया।
संगठन महामंत्री ने खुद डाटा जुटाया, नाम अनाउंस होते ही कैंडिडेट तक पहुंचाया
प्रदेश की 230 विधानसभाओं में सभी का बूथ स्तर तक का डाटा संगठन महामंत्री ने खुद तैयार कराया। जैसे ही कैंडिडेट की घोषणा होती उसे तुरंत विधानसभा क्षेत्र का बूथ स्तर तक पूरा डाटा अवेलेबल करवा दिया जाता। इससे चुनाव की राह आसान होती गई। भाजपा के लिए कौन-कौन सी कमजोर सीटें हैं और कहां-कहां कमजोर बूथ हैं, इस पर उन्होंने सबसे ज्यादा फोकस किया।
हर बूथ पर जीत के लिए करीब 65 हजार बूथ समितियों के पास यह डाटा चुनाव से पहले ही पहुंच चुका था कि उनके बूथ पर कितने वोटर हैं और कितने वोट उन्हें भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में आएंगे तो बूथ पर जीत संभव होगी। 80 साल से अधिक के वोटर, सरकार की स्कीम्स का फायदा उठाने वाले वोटर, यूथ वोटर, लाडली बहना, इंटेलेक्चुअल्स और ओपिनियन मेकर्स सभी से संपर्क के लिए अलग-अलग श्रेणी के कार्यकर्ताओं और मोर्चो के कार्यकर्ताओं को लगा दिया गया। इनसे संपर्क और संवाद हुआ तो जनादेश बीजेपी के पक्ष में होता गया।
89 कमजोर सीटों के लिए बनाई खास रणनीति
बीजेपी ने सबसे जरूरी काम कैंडिडेट्स का नाम अनाउंस करने में किया। इसमें भाजपा के लिहाज से कमजोर 89 सीटों के लिए खास रणनीति बनाई गई। इलेक्शन कमीशन द्वारा चुनाव की तारीख घोषित किए जाने के 53 दिन पहले ही बीजेपी ने अपने 39 कैंडिडेट्स की घोषणा कर दी थी। इसके बाद बाकी सीटों पर भी सभी पहलुओं की बारीकी से स्टेडी कर कैंडिडेट्स मैदान में उतारे गए। उम्मीदवारों को जनता के बीच जाने और अपनी बात कहने का पूरा समय मिला और पार्टी की यह रणनीति सफल रही। पीएम मोदी ने बूथ विस्तारक प्रशिक्षण में जनता की सेवा का मंत्र दिया। प्रदेश संगठन में इसे आगे बढ़ाया और अपने कार्यकर्ताओं को काम में लगा दिया। इससे लोगों में पार्टी को लेकर बेहतर माहौल बनने लगा।
गृह मंत्री अमित शाह प्रदेश के दौरों पर आकर संगठन की बैठकें ले रहे थे। बैठकों में अमित शाह ने जो पॉइंट्स बताए, उन्हें पूरी सीरियसनेस के साथ अमल में लाया गया। उनके हर पॉइंट को नोट करके ग्राउंड लेवल तक पहुंचाया गया। इन्हीं के हिसाब से काम भी करवाया गया। सभी कम्युनिटी को साथ लाने के लिए अलग-अलग कम्युनिटी के लोगों के साथ मीटिंग की गईं। इनमें पार्टी के प्रमुख नेताओं ने कम्युनिटी के प्रमुख लोगों के साथ मिलकर बातचीत की और पूरे कोर्डिनेशन के साथ आगे बढ़े।
बड़ी बैठकों के बजाए छोटी टोली बैठकों पर फोकस किया
बीजेपी संगठन का बड़ी बैठकों की बजाय छोटी टोली बैठकों पर ज्यादा फोकस रहा। ऐसी बैठकों में ज्यादा प्रभावी तरीके से संगठन की बात समाज के विभिन्न समूहों के बीच पहुंचाने में पार्टी सफल रही। पर्दे के पीछे काम कर रहे यह रणनीतिकार पूरे चुनाव के दौरान एक्टिव रहे। इंफॉर्मेशन और टेक्नोलॉजी का बखूबी उपयोग किया गया। स्टेट लेवल पर कॉल सेंटर और मीडिया सेंटर बनाया गया यही व्यवस्था विधानसभा स्तर तक की गई।
कॉल सेंटर में यहां तक ध्यान रखा गया कि कॉलर संबंधित क्षेत्र की बोली का विशेष ज्ञान रखने वाला होना चाहिए ताकि वोटर से सीधा संपर्क हो सके। प्रदेश में पार्टी दो स्तर पर काम कर रही थी। प्रदेश भाजपा कार्यालय से तो सूचनाओं का आदान-प्रदान कार्यकर्ताओं तक हो ही रहा था, इधर प्रदेश संगठन महामंत्री का कार्यालय भी पूरे समय एक्टिव रहा। दो लेवल पर काम होने से कोई चूक होने की स्थिति नहीं बनी। पर्दे के पीछे से कम कर रहे इन रणनीतिकारों के बेहद तेज इनफॉरमेशन लेने और उस पर उतनी ही तेजी से काम किए जाने से छोटी बड़ी हर तरह की चुनौतियों से निपटा जाता रहा।