आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस/आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : बीजेपी के लिए गढ़ मानी जाने वाली गोविंदपुरा विधानसभा सीट पर इस बार मतदाताओं की नाराजगी का सामना भाजपा प्रत्याशी कृष्णा गौर को करना पड़ सकता है। जीत के बाद लोगों की समस्याओं के निराकरण की अनदेखी के चलते इस क्षेत्र में रहने वाले वोटर्स गुस्सा है।
अजेय मानी जाने वाली इस सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर कृष्णा गौर पर दांव खेला है। इसलिए कांग्रेस के उम्मीदवार रवींद्र साहू के सामने कृष्णा गौर के खिलाफ उपजे गुस्से को भुनाने की चुनौती है।
आठ बार अजेय रहे बाबूलाल गौर
पूर्व मुख्यमंत्री और बुलडोजर मंत्री के रूप में अपनी ख्याति बनाए रखने वाले बाबूलाल गौर गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से आठ बार विधायक रहे। इसके बाद पिछले चुनाव में गौर के प्रयासों से उनकी बहू और भोपाल की पूर्व महापौर कृष्णा गौर को टिकट मिला और कृष्णा चुनाव जीतने में सफल भी रहीं। उन्हें 2018 के चुनाव में 1 लाख 25 हजार 487 वोट मिले थे और प्रदेश के टाप टेन मतों से जीतने वाली विधायकों में उनका नाम रहा। कृष्णा को चुनाव में 58 प्रतिशत वोट मिले थे। इस चुनाव में गिरीश शर्मा को 79 हजार वोट मिले थे।
यह थी पिछले चुनाव में सीट की स्थिति
2018 में 17 उम्मीदवारों ने नामांकन भरे थे।
कुल वोटर्स की संख्या 350979 थी।
पुरुष मतदाता 187525 और महिला वोटर की संख्या 163435 थी।
कुल 214302 (61.6%) वोटर्स ने वोट डाले थे।
नोटा के खाते में 2043 (0.6%) वोट आए थे।
रवींद्र साहू के लिए आसान नहीं गढ़ में सेंध लगाना
बीजेपी विधायक के रूप में कृष्णा गौर के कार्यकाल से मतदाता खुश नहीं है। सड़क, सीवेज, पानी समेत लोगों को मूलभूत सुविधाएं देने के लिए किए गए वादों पर कृष्णा खरी नहीं उतरी हैं। सड़कों की जर्जर दशा सुधारने की कम्प्लेन के बाद भी लोगों को आश्वासन के सिवा पांच साल में कुछ नहीं मिला है। बीजेपी के इस गढ़ में विधायक के प्रति लोगों में भरे गुस्से के बावजूद कांग्रेस के लिए यहां सेंध लगा पाना आसान नहीं है। कांग्रेस के उम्मीदवार रवींद्र साहू यहां टिकट मिलने के पहले से लगातार दौरे कर रहे हैं और समस्याओं से जूझ रहे लोगों ने उन्हें समर्थन देने के लिए भी कहा है लेकिन यहां का वोटर अंतिम समय में अपना मूड बदल देता है। इसलिए साहू को आने वाले 20 दिनों में गोविंदपुरा के मतदाता के मूड को कृष्णा गौर के प्रति नाराजगी के रूप में ताजा बनाए रखने की चुनौती है। ऐसा हो पाया तो ही बीजेपी के गढ़ में जीत का तिलिस्म टूट सकेगा।
1972 के बाद नहीं जीती कांग्रेस
इस विधानसभा सीट पर आखिरी बार कांग्रेस 1972 के चुनाव में जीती थी। इसके बाद 1977 में इस सीट को भाजपा के लक्ष्मी नारायण शर्मा ने जीत हासिल की। 1980 में बाबूलाल गौर यहां से पहली बार जीते और इसके बाद से जीत का सिलसिला जारी है। यह सीट बीजेपी के लिए अजेय गढ़ बन गया है। यहां बीजेपी की जीत में भेल कर्मचारियों की भी बड़ी भूमिका रहती है। इसके अलावा कर्मचारी, व्यापारी और समाज के सभी तबके के लोग इस क्षेत्र में निवास करते हैं।