सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ दिल्ली: नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और पत्नी की आत्महत्या से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ या ‘निकम्मा’ कहना, अपने आप में आपराधिक क्रूरता या धमकी का अपराध नहीं बनता। अदालत के अनुसार, इस तरह की भाषा पति के स्वभाव को दर्शा सकती है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसे पत्नी की आत्महत्या के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने महाराष्ट्र से जुड़े मामले में पति के खिलाफ दर्ज दहेज मृत्यु और उत्पीड़न की प्राथमिकी तथा उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द कर दी। पत्नी की 11 जून 2023 को कनाडा के टोरंटो में आवासीय इमारत की 22वीं मंजिल से गिरने के बाद मृत्यु हो गई थी। मामले में उसके पिता ने पति और ससुराल पक्ष पर दहेज मांगने तथा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग और पत्नी की मृत्यु के बीच आवश्यक संबंध स्थापित करने वाला ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत के अनुसार, दहेज मृत्यु से जुड़े अपराध के लिए यह साबित करना जरूरी है कि मृत्यु से ठीक पहले महिला को दहेज की मांग के संबंध में उत्पीड़न या प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी।

पीठ ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में लगाए गए आरोपों की सावधानीपूर्वक जांच होनी चाहिए। पति के रिश्तेदारों को केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर आपराधिक मामले में नहीं घसीटा जाना चाहिए। प्रत्येक आरोपी के खिलाफ विशिष्ट घटना और उसके समर्थन में सामग्री होनी चाहिए।

अदालत ने मृतका के परिवार के दुख के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि किसी को भी पर्याप्त साक्ष्य के बिना आपराधिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती।


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