सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : नई दिल्ली। नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद मामले की पीठ और रोस्टर के अनुसार सूचीबद्धता को लेकर सवाल उठे हैं। ये याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिसमें छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत को रद्द कर दिया गया था। 23 सितंबर को मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने की। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, 13 जुलाई 2026 से लागू सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर में बंदी प्रत्यक्षीकरण और निवारक हिरासत से जुड़े मामले वरिष्ठता क्रम में शुरुआती चार पीठों को सौंपे गए हैं। इनमें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की पीठें शामिल हैं।
मामले में सवाल इसलिए भी उठा क्योंकि नोएडा मजदूर प्रदर्शन से जुड़े कुछ अन्य हिरासत संबंधी मामले पहले से न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष लंबित हैं। मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं को भी निवारक हिरासत से संबंधित श्रेणी में रखा गया है, लेकिन यह श्रेणी न्यायमूर्ति शर्मा की नियमित रोस्टर सूची में दिखाई नहीं देती। हालांकि, उनके रोस्टर में विशेष रूप से सौंपे गए मामलों के लिए प्रावधान मौजूद है। उपलब्ध रिपोर्टों में इस मामले को विशेष रूप से उसी आधार पर सौंपे जाने की संभावना व्यक्त की गई है, लेकिन इसके संबंध में सुप्रीम कोर्ट प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की हिरासत को गैरकानूनी ठहराते हुए मेधा रूपम की व्यक्तिगत वेतन से पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद यह निर्देश फिलहाल प्रभावी नहीं है। मामले में अब रोस्टर के तहत सूचीबद्धता, पहले से लंबित जुड़े मामलों और विशेष आवंटन की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आगे के आदेश के लिए अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
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