Biswarup Ganguly / Wikimedia Commons (CC BY 3.0). Cropped.
आज से ठीक दस साल पहले, 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1,000 रुपये के नोट बंद करने का ऐलान किया था। इससे चलन में मौजूद करीब 86% नकदी रातों रात बेकार हो गई थी। दस साल बाद आंकड़े बताते हैं कि लोगों ने डिजिटल भुगतान अपनाया, पर नकदी नहीं छोड़ी।
बिजनेस स्टैंडर्ड में उद्धृत वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक नोटबंदी के ऐलान के समय चलन में मुद्रा 17.77 लाख करोड़ रुपये थी। रिजर्व बैंक के साप्ताहिक आंकड़ों में 23 अक्टूबर 2026 को यह 43.16 लाख करोड़ रुपये रही। अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से देखें तो नकदी 2015–16 में जीडीपी का 12.1% थी, अगले साल घटकर 8.7% हुई और 2025–26 में फिर करीब 12% पर पहुंच गई, लगभग वहीं जहां से चली थी।
डिजिटल भुगतान इससे कहीं बड़े पैमाने पर बढ़ा। एनपीसीआई के आंकड़ों के अनुसार 2016 में शुरू हुए यूपीआई पर 2016–17 में 1.78 करोड़ लेनदेन हुए थे, जबकि 2025–26 में करीब 24,162 करोड़ लेनदेन हुए, जिनकी कीमत लगभग 314 लाख करोड़ रुपये रही।
ये रुझान एक दूसरे के उलट नहीं हैं। रिजर्व बैंक के 2023 के एक अध्ययन में पाया गया कि लोग भुगतान के लिए डिजिटल तरीके ज्यादा अपना रहे हैं, लेकिन एहतियात और बचत के तौर पर नकदी रखते हैं।
बाकी घोषित लक्ष्यों का रिकॉर्ड कमजोर है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक बंद किए गए नोटों का 99.3% मूल्य बैंकिंग व्यवस्था में लौट आया। द हिंदू ने रविवार को रिजर्व बैंक के आंकड़ों के आधार पर बताया कि नकली नोट, खासकर 500 रुपये के नकली नोट पकड़े जाने के मामले बढ़े हैं।
उस नवंबर बैंकों की कतारों में खड़े परिवारों और छोटे कारोबारियों के लिए असली बदलाव भुगतान के तरीके में आया है। नकदी की जगह यूपीआई नहीं आया, बल्कि दोनों साथ चल रहे हैं।
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