सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : टैगोर नाट्य महोत्सव के अंतिम दिन रवीन्द्र भवन में कथाकार संतोष चौबे की चर्चित कहानी ‘सतह पर तैरती उदासी का प्रभावशाली नाट्य मंचन किया गया। प्रख्यात रंग निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर के निर्देशन में हुई इस प्रस्तुति को दिल्ली के संभव समूह ने मंच पर साकार किया। इस दौरान सुप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर पर केंद्रित पुस्तक रंगलोक का महानायक का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध गायिका एवं रंगकर्मी नगीन तनवीर अभिनेता एवं निर्देशक जॉन बशीर और विनय उपाध्याय भी मौजूद रहे।

कहानी रिश्तों की विडंबना को सामने लाती है, जहां कुछ संबंधों की नियति ही शायद कहीं न पहुंच पाना होती है। नाटक के केंद्र में पति-पत्नी और पत्नी की एक मित्र—तीन प्रमुख पात्र हैं। पति-पत्नी के बीच एक सहज और अच्छा संबंध होने के बावजूद पति का अपनी पत्नी की मित्र के प्रति आकर्षित होना कहानी को एक जटिल भावनात्मक मोड़ देता है। मित्र के मन में प्रेम है, लेकिन इस प्रेम के पूरा होने की कोई संभावना नहीं। यही अधूरापन उसके जीवन में गहरी उदासी का कारण बनता है।

नाटक की पृष्ठभूमि झारखंड के राजनगर शहर पर आधारित है। कहानी में निजी रिश्तों के साथ उस सामाजिक और औद्योगिक परिवेश को भी उभारा गया है, जिसमें एक कारखाने का बंद होना वहां के लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। इस युवती का एक प्रेमी था, जो कारखाने में काम करता था। एक संघर्ष के दौरान उसकी गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। घटना के बाद मामला चलता रहता है और कारखाना भी बंद हो जाता है।

इस तरह नाटक में एक ओर बंद होते कारखाने और दूसरी ओर निरंतर चलते जीवन का विरोधाभास दिखाई देता है। व्यक्तिगत रिश्तों की टूटन, अधूरे प्रेम और औद्योगिक पतन को एक साथ पिरोती यह कहानी दर्शकों को मानवीय संबंधों और बदलते सामाजिक परिवेश पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

लेखक संतोष चौबे कवि कथाकार और उपन्यासकार संतोष चौबे हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं जो साहित्य और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय रहे हैं। उनके छह कथा-संग्रह—हल्के रंग की कमीज रेस्त्रां में दोपहर नौ बिंदुओं का खेल बीच प्रेम में गांधी प्रतिनिधि कहानियां’ तथा मगर शेक्सपियर को याद रखना—और चार उपन्यास—राग केदार क्या पता कामरेड मोहन जल तरंग तथा सपनों की दुनिया में ब्लेकहोल’—प्रकाशित एवं चर्चित हैं। उनके कविता-संग्रहों में ‘कहीं और सच होंगे सपने कोना धरती का ‘इस अ-कवि समय में और घर बाहर शामिल हैं। उनकी कहानियों का मंचन भारत भवन और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली सहित विभिन्न मंचों पर हो चुका है तथा उनकी रचनाएं देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।

निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त देवेन्द्र राज अंकुर देशभर की अनेक व्यावसायिक एवं शौकिया नाट्य मंडलियों के साथ निर्देशन कर चुके हैं। ‘संभव’ समूह के संस्थापक सदस्य और ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता अंकुर अध्यापक, कैंप निर्देशक और नाट्य निर्देशक के रूप में देशभर की कार्यशालाओं से जुड़े रहे हैं।

उन्होंने विभिन्न भाषाओं के नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया है और रंगमंच विषयक लेखन भी किया है। रंग आलोचना पर उनकी सात से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। टैगोर फेलोशिप प्राप्त प्रो. अंकुर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रह चुके हैं। रंगमंच के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।


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