सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस | आईटीडीसी न्यूज़, भोपाल :गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के तहत विकसित देशों की वित्तीय सहायता संबंधी प्रतिबद्धताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि विकसित देशों ने विकासशील और कम विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सालाना 100 अरब डॉलर की सहायता देने का वादा किया था, लेकिन उनके अनुसार सहायता की जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं किया गया। उन्होंने यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पर भी सवाल उठाए। इस व्यवस्था के तहत कुछ आयातित वस्तुओं पर उनके उत्पादन से जुड़े कार्बन उत्सर्जन के आधार पर शुल्क लगाया जाता है। भारत की चिंता है कि इससे भारतीय इस्पात और अन्य उद्योगों के निर्यात पर अतिरिक्त लागत का दबाव पड़ सकता है। भारत का रुख: विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण गोयल ने कहा कि भारत को 140 करोड़ से अधिक लोगों की ऊर्जा, खाद्य और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करना है। इसके बावजूद देश स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों, कचरा प्रबंधन और संसाधनों के पुनः उपयोग पर काम कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक बहस में भारत का जोर इस बात पर है कि देशों की जिम्मेदारी तय करते समय ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन, आर्थिक क्षमता और विकास की जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए। निष्कर्ष: पीयूष गोयल का बर्लिन में दिया गया बयान जलवायु न्याय और विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को लेकर भारत के रुख को सामने लाता है। इस बहस का मुख्य सवाल यह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने का बोझ किस तरह बांटा जाए, ताकि उत्सर्जन में कमी के साथ विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतें भी पूरी हो सकें।


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