सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने से शुरू हुई घटनाओं की एक खतरनाक श्रृंखला सामने आई है। ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा, जिसके बाद बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल प्रवाह नदी तंत्र में पहुंच गया। देखते ही देखते यह मलबा और पानी तेज रफ्तार वाले विनाशकारी सैलाब में बदल गया।

रिपोर्टों के अनुसार ग्लेशियर टूटने के बाद बर्फ और चट्टानों का मलबा लहेंदे खोला नदी में जा गिरा। वहां पहले से मौजूद पानी और मलबे के साथ मिलकर इसका حجم बढ़ता गया। इसके बाद यह प्रवाह भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र की ओर बढ़ा और रास्ते में आने वाले कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। विशेषज्ञों के अनुसार नदी का जलस्तर कुछ स्थानों पर बहुत कम समय में कई मीटर तक बढ़ गया।

एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लेशियर टूटने के बाद सैलाब करीब 20 किलोमीटर की दूरी महज सात मिनट में तय कर गया, जिससे इसकी अनुमानित गति लगभग 180 किलोमीटर प्रति घंटा बैठती है। इतनी तेज गति से पानी, बर्फ, चट्टान और मिट्टी का मिश्रण नीचे आने के कारण लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने का बेहद कम समय मिला।

इस आपदा ने नेपाल-चीन सीमा के आसपास के क्षेत्रों में सड़कों, पुलों, घरों और ऊर्जा परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और हजारों सुरक्षा कर्मियों को प्रभावित इलाकों में तैनात किया गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय तेजी से बदल रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ तथा चट्टानों की अस्थिरता से ग्लेशियर से जुड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक जांच जरूरी है।

नेपाल की यह त्रासदी एक बार फिर दिखाती है कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और संभावित बाढ़ के स्रोतों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और समय पर निकासी की व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है।


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