सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : भोपाल: बार-बार हो रहे राजनीतिक दल-बदल, बदलते गठबंधन और चुनाव के बाद होने वाली नई सियासी जमावट के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारतीय मतदाता अपने वोट की ताकत पर धीरे-धीरे भरोसा खो रहे हैं। हाल में Shiv Sena (UBT) के छह सांसदों के Eknath Shinde के नेतृत्व वाले गुट में जाने के बाद यह सवाल फिर उभरा है कि क्या वोट डाले जाने के बाद चुनावी जनादेश का स्वरूप बदला जा रहा है। इस घटनाक्रम ने दल-बदल विरोधी प्रावधानों की प्रभावशीलता और चुने हुए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने की मतदाताओं की क्षमता पर भी सवाल खड़े किए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी बदलने, गठबंधन फेरबदल और चुनावी प्रक्रिया से बाहर सरकारों में बदलाव की बार-बार होने वाली घटनाएं जनता में निराशा बढ़ा सकती हैं, भले ही भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं नियमित और व्यापक पैमाने पर चुनाव कराती रही हैं। वहीं, एक मत यह भी है कि ऐसे राजनीतिक बदलाव संसदीय लोकतंत्र का हिस्सा हैं और संवैधानिक तथा कानूनी ढांचे के दायरे में आते हैं।

यह बहस मतदाता मतदान, संस्थाओं पर सार्वजनिक भरोसे और जवाबदेही मजबूत करने के लिए चुनावी सुधारों की जरूरत जैसे मुद्दों तक भी फैलती है। सवाल यह है कि जनता के जनादेश की पवित्रता बनाए रखने के लिए मौजूदा व्यवस्था कितनी पर्याप्त है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां चुनावी भागीदारी लगातार ऊंची रही है। इसके बावजूद यह चर्चा इस बढ़ती जनचिंता को सामने लाती है कि क्या हर वोट अब भी उसी राजनीतिक परिणाम में बदलता है, जिसकी अपेक्षा नागरिक मतदान करते समय करते हैं।


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