सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे के पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने संबंधी बांड पर हस्ताक्षर करने को लेकर सवाल उठाए। काटजू ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि इस फैसले से चारों नेताओं की सार्वजनिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोग अब उन्हें जेल जाने से डरने वाले नेताओं के रूप में देखेंगे।
‘पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर से करियर खत्म’ काटजू ने अपनी पोस्ट में चारों नेताओं को ‘गैंग ऑफ फोर’ करार दिया। उनका कहना था कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद यदि ये नेता दोबारा किसी सार्वजनिक प्रदर्शन में शामिल होते हैं, तो पुलिस इसे बांड की शर्तों का उल्लंघन मान सकती है। काटजू ने इसे नेताओं के राजनीतिक भविष्य और सार्वजनिक छवि के लिए नुकसानदायक बताया। उन्होंने इस मामले में छात्र नेता नेहा बोरा की तारीफ भी की। काटजू के अनुसार, नेहा ने पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को अपना संवैधानिक अधिकार बताया। ये टिप्पणियां काटजू की निजी राय हैं, न कि किसी अदालत का निष्कर्ष।
क्या है CJP नेताओं का मामला? CJP के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर बैरिकेड पार करने और प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के मामले में हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने उन पर कानून-व्यवस्था से जुड़े नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए थे। इसके बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
21 अक्टूबर को विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने शांति बनाए रखने संबंधी लिखित आश्वासन और बांड स्वीकार करने के बाद दोनों की रिहाई का आदेश दिया। उन्होंने आश्वासन दिया कि जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित न रहने तक वे वहां प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे और आगे के विरोध प्रदर्शनों में संवैधानिक दायरे का पालन करेंगे।
राजनीतिक और कानूनी बहस तेज काटजू की टिप्पणी के बाद पीस बॉन्ड की शर्तों, विरोध प्रदर्शन के अधिकार और नेताओं की राजनीतिक रणनीति को लेकर बहस छिड़ गई है। एक ओर आलोचक इसे नेताओं की सार्वजनिक छवि से जोड़ रहे हैं, वहीं शांतिपूर्ण विरोध के समर्थक संवैधानिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया के महत्व पर जोर देते हैं।
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