मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा जनजाति अध्ययन विषय पर आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का आज भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) में राजभाषा विभाग द्वारा "कार्यालयीन कार्यों में हिंदी लेखन हेतु डिजिटल साधन" विषय पर हिंदी कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के मुख्य वक्ता कार्यालय प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त (मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़), भोपाल के उप निदेशक (राजभाषा) एवं नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति-3 के सदस्य सचिव अनिल त्रिपाठी थे। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभारी निदेशक डॉ. मनीषा श्रीवास्तव एवं मुख्य वक्ता द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से किया गया।
अपने व्याख्यान में अनिल त्रिपाठी ने कार्यालयीन हिंदी लेखन को सरल, प्रभावी एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा विकसित विभिन्न डिजिटल साधनों एवं भाषा प्रौद्योगिकी आधारित ई-टूल्स की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन डिजिटल साधनों के माध्यम से हिंदी में टिप्पणियां, पत्र, कार्यालयीन आदेश एवं अन्य दस्तावेज अधिक शुद्ध, सरल एवं प्रभावी ढंग से तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से इन उपकरणों का नियमित उपयोग कर कार्यालयीन कार्यों में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रभारी निदेशक डॉ. मनीषा श्रीवास्तव ने कहा कि बीएमएचआरसी के सभी प्रशासनिक विभागों में कार्यालयीन कार्य हिंदी में किए जा रहे हैं। संस्थान में राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है। साथ ही कर्मचारियों को हिंदी टंकण एवं कार्यालयीन हिंदी का नियमित प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिससे वे अपने दैनिक कार्यों का निष्पादन हिंदी में अधिक दक्षता के साथ कर सकें।

कार्यशाला में बीएमएचआरसी के विभिन्न प्रशासनिक विभागों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।समापन हुआ l
समापन सत्र में प्रोफेसर विवेक कुमार आईआईटी दिल्ली ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आज इस बात की आवश्यकता है कि इस संगोष्ठी में उपलब्ध जो 10 विश्वविद्यालयों के कुलगुरु महोदय ने इच्छा जाहिर की है कि वह जनजाति अध्ययन विषय पर पाठ्यक्रम संचालित करना चाहते हैं , वे सर्वप्रथम जनजातीय शोध एवं ज्ञान केंद्र नई दिल्ली के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर ले ताकि उन्हें विकसित किया हुआ पाठ्यक्रम और अध्ययन सामग्री के विकास संबंधी अन्य दिशा निर्देश मिल जाए और जनजाति अध्ययन के लिए आवश्यक पाठ्य सामग्री का निर्माण किया जा सकेlल।
इस संगोष्ठी में इस बात पर भी सहमति बनी कि विश्वविद्यालय आपस में एक समूह का निर्माण करें जो कि जनजाति अध्ययन विषय को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पाठ्यक्रमों का निर्माण और अध्ययन सामग्री और पाठ्य पुस्तकों का निर्माण करने में आपस में सहायता कर सके। प्रत्येक विश्वविद्यालय जनजाति अध्ययन हेतु एक विभाग या शोध केंद्र की स्थापना करें और उसके लिए एक उपयुक्त अनुभवी प्रोफेसर को नोडल अधिकारी नियुक्त करें l इस कार्य हेतु जनजातीय अध्ययन में विशेषज्ञ रखने वाले रिसर्च एसोसिएट और रिसर्च अस्सिटेंट की नियुक्ति भी किया जाना आवश्यक होगा और प्रत्येक विश्वविद्यालय अपने-अपने अधिनियम के अनुसार उनकी नियुक्ति करेंगे। इस बात पर सहमति व्यक्त की गई की जनजातीय शोध एवं ज्ञान केंद्र सभी विश्वविद्यालय को विषय विशेषज्ञ की एक सूची भी साझा करें जिससे विश्वविद्यालय को उनसे अध्ययन सामग्री विकसित करने में सहायता मिलेl उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीनो में सभी विश्वविद्यालय में जनजातीय अध्ययन विषय पर बोर्ड ऑफ स्टडी का गठन भी करना होगा l इस संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया की जनजाति अध्ययन सर्वप्रथम स्नातक स्तर पर एक विषय के रूप में प्रारंभ किया जाए और इसके पश्चात स्नातकोत्तर विषय के पाठ्यक्रम चालू किए जाएं इससे जनजाति अध्ययन विषय को यूजीसी नेट में एक विषय के रूप में सम्मिलित करने में सहायता मिलेगी l विभिन्न विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने इस बात पर भी सहमति व्यक्ति की कि हमें विद्यार्थी विनिमय कार्यक्रम चालू करने पर विचार करना चाहिए l मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर मिलिंद दांडेकर के जनजातीय विषय पर पाठ्यक्रम चालू करने के संकल्प औरआभार प्रदर्शन के साथ ही संगोष्ठी का समापन हुआ l
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