सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ दिल्ली : नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत की कूटनीति को एक महत्वपूर्ण अवसर के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी दी है। विस्तारित ब्रिक्स में अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित रखने वाले देशों को एक मंच पर लाना आसान नहीं था। इसके बावजूद नई दिल्ली घोषणा-पत्र को स्वीकार किया गया और वैश्विक शासन सुधार, बहुपक्षवाद, आर्थिक सहयोग, तकनीक, ऊर्जा, आतंकवाद और विकास जैसे मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण सामने आया।

1. भारत के लिए पहला परीक्षण रहा सफल

भारत की अध्यक्षता का सबसे बड़ा परीक्षण यही था कि क्या वह अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों के बीच न्यूनतम सहमति बना सकता है। चीन, रूस, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात सहित विभिन्न रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देशों की मौजूदगी के बीच सहमति बनना अपने आप में कूटनीतिक उपलब्धि है। लेकिन इसे अंतिम सफलता मानना जल्दबाजी होगी। असली परीक्षा अब शुरू होती है।

2. घोषणा-पत्र से आगे बढ़ना जरूरी

ब्रिक्स की बैठकों में घोषणाएं और संकल्प लगातार सामने आते रहे हैं। चुनौती यह है कि इन संकल्पों को वास्तविक नीतियों और संस्थागत तंत्र में बदला जाए। नई दिल्ली घोषणा-पत्र में भी परिणामोन्मुख सहयोग, निरंतरता और संस्थागत विकास पर जोर दिया गया है।

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि 2026 की अध्यक्षता में शुरू किए गए महत्वपूर्ण कार्यक्रम अगली अध्यक्षता के साथ समाप्त न हों, बल्कि उनका नियमित मूल्यांकन और क्रियान्वयन जारी रहे।

3. आतंकवाद पर भारत को मिला महत्वपूर्ण समर्थन

भारत के लिए आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट भाषा विशेष महत्व रखती है। नई दिल्ली घोषणा-पत्र में आतंकवाद और उसके वित्तपोषण के खिलाफ सख्त रुख दोहराया गया। यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर राजनीतिक मतभेद अक्सर सामने आते रहे हैं।

अब आवश्यकता केवल बयान देने की नहीं, बल्कि आतंकवाद की फंडिंग, भर्ती, सुरक्षित ठिकानों और डिजिटल नेटवर्क के खिलाफ व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने की है।

4. भारत-चीन संबंधों में संवाद का नया अवसर

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संवाद ने भारत-चीन संबंधों को लेकर नई संभावना पैदा की है। दोनों देशों के बीच संबंधों में लंबे समय से सीमा विवाद और रणनीतिक अविश्वास की चुनौती रही है। हालिया बातचीत तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन इसे समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता।

भारत को संवाद जारी रखते हुए सीमा सुरक्षा, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर अपने हितों की रक्षा करनी होगी।

5. चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों

भारत के लिए चीन एक साथ बड़ा व्यापारिक साझेदार और महत्वपूर्ण रणनीतिक चुनौती है। यही द्वंद्व ब्रिक्स में भारत की भूमिका को जटिल बनाता है। चीन के साथ हर सहयोग को सुरक्षा के नजरिए से देखना उचित नहीं होगा, लेकिन आर्थिक सहयोग के नाम पर रणनीतिक जोखिमों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती।

भारत की नीति स्पष्ट होनी चाहिए—जहां साझा हित हैं वहां सहयोग, जहां राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं वहां दृढ़ता।

6. ब्रिक्स को किसी विरोधी गुट में बदलना उचित नहीं

ब्रिक्स का भविष्य तभी मजबूत हो सकता है जब वह किसी एक देश या पश्चिमी शक्तियों के खिलाफ राजनीतिक गठबंधन बनने के बजाय विकास और बहुपक्षीय सहयोग का मंच बना रहे। भारत का हित इसी में है कि ब्रिक्स अमेरिका या यूरोप का विकल्प बनने के बजाय वैश्विक व्यवस्था में अतिरिक्त आवाज और विकल्प प्रदान करे।

भारत को रूस, अमेरिका, यूरोप, चीन और पश्चिम एशिया—सभी के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने चाहिए। यही रणनीतिक स्वायत्तता की वास्तविक परीक्षा है।

7. वैश्विक दक्षिण की आवाज को परिणाम चाहिए

ब्रिक्स स्वयं को ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है। लेकिन वैश्विक दक्षिण के देशों को केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि विकास, निवेश, तकनीक, वित्त और बाजारों तक बेहतर पहुंच चाहिए।

भारत को ब्रिक्स के भीतर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की व्यावहारिक जरूरतों को प्राथमिकता दिलाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। घोषणा-पत्र में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की वैश्विक निर्णय-प्रक्रियाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग भी दोहराई गई है।

8. व्यापार और भुगतान व्यवस्था सबसे बड़ी कसौटी

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार डिजिटल भुगतान जैसे विचार लंबे समय से ब्रिक्स के एजेंडे में हैं। इनका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि सदस्य देश वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अधिक विकल्प चाहते हैं। लेकिन वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था बनाना तकनीकी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर जटिल प्रक्रिया है।

भारत को ऐसी व्यवस्था पर जोर देना चाहिए जो पारदर्शी, सुरक्षित, लागत-कुशल और व्यापारियों के लिए वास्तव में उपयोगी हो। केवल सरकारी घोषणाओं से अंतरराष्ट्रीय व्यापार की आदतें नहीं बदलेंगी।

9. तकनीक और एआई में बड़ा अवसर

विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार ब्रिक्स सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकते हैं। नई दिल्ली घोषणा-पत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तकनीक, अनुसंधान सहयोग और नवाचार को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।

भारत को यहां केवल उपभोक्ता या बाजार की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। भारतीय स्टार्टअप, शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों और तकनीकी कंपनियों को ब्रिक्स के साझा नवाचार तंत्र से जोड़ना चाहिए।

10. ऊर्जा सुरक्षा भी प्राथमिकता बने

ब्रिक्स देशों की ऊर्जा जरूरतें अलग-अलग हैं। कुछ देश जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं, जबकि कुछ नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इसलिए ऊर्जा संक्रमण का मॉडल सभी देशों के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। नई दिल्ली घोषणा-पत्र ने न्यायपूर्ण, व्यवस्थित और समावेशी ऊर्जा संक्रमण तथा ऊर्जा सुरक्षा पर जोर दिया है।

भारत के लिए सस्ती ऊर्जा, स्थिर आपूर्ति और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक—तीनों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण रहेगा।

11. संस्थागत निरंतरता जरूरी

ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक यह रही है कि अध्यक्षता बदलने के साथ प्राथमिकताओं में भी बदलाव आ सकता है। भारत ने ब्रिक्स के भीतर निरंतरता और क्रियान्वयन के तंत्र पर जोर दिया है। यह पहल सफल होती है तो संगठन की विश्वसनीयता बढ़ सकती है।

अब जरूरत है कि योजनाओं के लिए स्पष्ट समयसीमा, जिम्मेदार संस्थाएं और प्रगति मापने के मानक तय किए जाएं।

12. विस्तार से बढ़ी ताकत, लेकिन बढ़ीं चुनौतियां भी

ब्रिक्स का विस्तार उसकी वैश्विक पहुंच बढ़ाता है, लेकिन जितने अधिक सदस्य होंगे, उतने ही अधिक हित और मतभेद सामने आएंगे। चीन-भारत प्रतिस्पर्धा, पश्चिम एशिया के तनाव और रूस-पश्चिम संबंध जैसे मुद्दे संगठन के भीतर सहमति को कठिन बनाते हैं।

इसलिए ब्रिक्स को एकरूप राजनीतिक संगठन बनाने की कोशिश के बजाय विविध देशों के बीच सहयोग का व्यावहारिक मंच बनाना अधिक उपयोगी होगा।

13. भारत को संतुलन की नीति जारी रखनी होगी

भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत यही है कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संवाद कर सकता है। रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध, अमेरिका के साथ तकनीक और रणनीतिक सहयोग, यूरोप के साथ व्यापार, चीन के साथ आर्थिक संबंध और पश्चिम एशिया के देशों के साथ ऊर्जा तथा निवेश संबंध—इन सभी को एक साथ संभालना भारत की आवश्यकता है।

किसी एक धड़े के साथ पूरी तरह खड़ा होना भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।

14. 2027 में चीन की अध्यक्षता महत्वपूर्ण होगी

2027 में चीन ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा। इसका अर्थ है कि भारत द्वारा 2026 में बनाए गए कई तंत्र अब चीन की प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ेंगे।

भारत को इसलिए अभी से यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स की संस्थागत दिशा किसी एक देश के प्रभाव में अत्यधिक न झुके। संगठन की सामूहिकता और सर्वसम्मति ही उसकी विश्वसनीयता की आधारशिला होनी चाहिए।

15. अंतिम लक्ष्य—भारत के लिए ठोस लाभ

भारत के लिए ब्रिक्स की सफलता का मूल्यांकन अंततः इस आधार पर होना चाहिए कि इससे देश को क्या मिला। क्या भारतीय निर्यात बढ़े? क्या निवेश आया? क्या तकनीकी सहयोग बढ़ा? क्या स्टार्टअप और एमएसएमई को नए बाजार मिले? क्या ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई? क्या आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहतर हुआ? क्या वैश्विक संस्थाओं में भारत और विकासशील देशों की आवाज मजबूत हुई?

इन सवालों के ठोस जवाब ही किसी भी शिखर सम्मेलन की वास्तविक उपलब्धि तय करेंगे।

निष्कर्ष: कूटनीति से परिणाम तक

नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि दी है। अलग-अलग रणनीतिक हितों वाले देशों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं था। लेकिन अब भारत के सामने इससे भी कठिन जिम्मेदारी है—इस सहमति को वास्तविक सहयोग में बदलना।

भारत को ब्रिक्स को न तो पश्चिम-विरोधी मंच बनने देना चाहिए और न ही इसे केवल वार्षिक राजनीतिक सम्मेलन तक सीमित रखना चाहिए। इसे व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, निवेश, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य, विज्ञान और विकास का परिणामोन्मुख मंच बनाना होगा।

आज की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की भूमिका किसी एक खेमे का हिस्सा बनने की नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करते हुए विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संवाद और सहयोग की संभावना बनाए रखने की है। नई दिल्ली ने सहमति बनाने की क्षमता दिखाई है; अब भारत को उस सहमति को परिणामों में बदलकर दिखाना होगा।


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