सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ दिल्ली : भारत और रूस के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रस्तावित मुलाकात ऐसे समय हो रही है, जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले दोनों नेताओं की बातचीत व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग और आर्थिक संबंधों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
रक्षा सहयोग से आगे बढ़ने की जरूरत
भारत-रूस संबंधों में रक्षा सहयोग लंबे समय से सबसे मजबूत स्तंभ रहा है। लेकिन बदलती सुरक्षा जरूरतों के बीच अब केवल हथियारों की खरीद पर्याप्त नहीं है। भारत की प्राथमिकता तकनीक हस्तांतरण, संयुक्त उत्पादन और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना होनी चाहिए। रूस के साथ रक्षा साझेदारी को ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत की व्यापक रणनीति से जोड़ना भारत के दीर्घकालिक हित में होगा।
ऊर्जा और परमाणु सहयोग का महत्व
ऊर्जा सुरक्षा भारत की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण आधार है। रूस के साथ तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा में सहयोग भारत को दीर्घकालिक ऊर्जा विकल्प उपलब्ध करा सकता है। आगामी वार्ता में परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण रहेंगी।
हालांकि भारत को ऊर्जा संबंधों में संतुलन भी बनाए रखना होगा। किसी एक देश या स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए रूस के साथ सहयोग बढ़ाते हुए भारत को ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता भी बनाए रखनी होगी।
व्यापार को तेल से आगे ले जाना होगा
भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों में हाल के वर्षों में ऊर्जा, विशेषकर रूसी तेल की भूमिका काफी बढ़ी है। लेकिन एक मजबूत और टिकाऊ आर्थिक साझेदारी के लिए व्यापार का दायरा तेल से आगे बढ़ाना जरूरी है। रक्षा विनिर्माण, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि, उर्वरक, खनिज, प्रौद्योगिकी और औद्योगिक निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।
स्थानीय मुद्राओं में भुगतान व्यवस्था भी दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में मदद कर रही है। रूस के अनुसार, भारत-रूस व्यापार का बड़ा हिस्सा अब रुपये और रूबल के माध्यम से निपटाया जा रहा है।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। रूस के साथ मजबूत संबंध होने के बावजूद भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार संबंध विकसित कर रहा है। यही संतुलन भारत को किसी एक भू-राजनीतिक खेमे पर निर्भर होने से बचाता है।
रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिमी देशों के साथ रूस के तनाव ने भारत के लिए यह संतुलन और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। भारत लगातार संवाद और कूटनीति को संघर्षों के समाधान का रास्ता बताता रहा है। अगस्त में मोदी और पुतिन की बैठक में भी दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचार साझा किए थे तथा भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर सहमति जताई थी।
ब्रिक्स के मंच पर भारत की बड़ी जिम्मेदारी
इस बार ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए केवल एक बहुपक्षीय आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी है। भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स को केवल राजनीतिक विमर्श का मंच बनाने के बजाय व्यापार, तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और विकास सहयोग का व्यावहारिक मंच बनाने पर जोर होना चाहिए।
रूस और चीन जैसे महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ संबंधों को संभालते हुए भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स किसी एक देश या किसी एक भू-राजनीतिक एजेंडे का मंच न बने। भारत का हित एक ऐसे बहुपक्षीय ढांचे में है जो विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करे और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में ठोस पहल करे।
निष्कर्ष
मोदी-पुतिन वार्ता भारत-रूस संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है। दोनों देशों के बीच दशकों पुराना विश्वास इस साझेदारी की ताकत है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों का सामना केवल पुराने संबंधों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अब जरूरत है कि रक्षा और ऊर्जा से आगे बढ़कर तकनीक, निवेश, विनिर्माण, परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और व्यापार के नए क्षेत्रों में सहयोग को विस्तार दिया जाए। भारत को रूस के साथ अपनी मित्रता बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
भारत-रूस संबंधों की अगली कहानी केवल पुराने भरोसे की नहीं, बल्कि नई आर्थिक और तकनीकी साझेदारी की होनी चाहिए। यही बदलती वैश्विक व्यवस्था में दोनों देशों के रिश्तों को अधिक मजबूत, संतुलित और भविष्य के लिए उपयोगी बना सकता है।
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