सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ दिल्ली : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने भारत-रूस रणनीतिक रिश्तों में रक्षा सहयोग को फिर केंद्र में ला दिया है। सबसे ज्यादा नजर मॉस्को के उस नए प्रस्ताव पर है, जिसके तहत रूस ने अपने पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ लड़ाकू विमान Su-57 को भारत को देने की पेशकश दोहराई है। रूस ने संकेत दिया है कि बातचीत में तकनीक साझा करने और उत्पादन में संभावित सहयोग जैसे मुद्दे भी शामिल हो सकते हैं।

भारत के लिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि Su-57 खरीदा जाए या नहीं। असली प्रश्न यह है कि अगले दो दशकों में भारत को किस तरह की वायु-शक्ति क्षमता चाहिए और कोई भी विदेशी खरीद उसके स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के दीर्घकालिक लक्ष्य को मजबूत करेगी या कमजोर।

भारत के पास अभी कोई पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान नहीं है, जबकि चीन J-20 तैनात कर चुका है और उन्नत लड़ाकू विमान क्षमताओं पर लगातार काम कर रहा है। पाकिस्तान के बारे में भी खबरें हैं कि वह चीनी पांचवीं पीढ़ी के विमानों तक पहुंच की संभावना तलाश रहा है। इससे भारत के सामने वास्तविक क्षमता-अंतर पैदा होता है और अंतरिम समाधान पर बहस रणनीतिक रूप से जरूरी बनती है।

इसीलिए Su-57 को केवल एक और विदेशी रक्षा प्रस्ताव मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन इसे सिर्फ इसलिए स्वीकार भी नहीं किया जा सकता कि भारत के सामने तत्काल क्षमता की जरूरत है।

पहली कसौटी परिचालन प्रभावशीलता होनी चाहिए। भारत को विमान की स्टेल्थ क्षमता, रडार और सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां, हथियार एकीकरण, इंजन प्रदर्शन, नेटवर्किंग क्षमता और मौजूदा भारतीय प्लेटफॉर्मों के साथ संचालन की योग्यता का स्वतंत्र मूल्यांकन करना होगा। पांचवीं पीढ़ी का लेबल अपने आप युद्धक्षेत्र में बढ़त की गारंटी नहीं देता।

दूसरा और शायद अधिक बड़ा मुद्दा तकनीक हस्तांतरण है। रूस ने भारत के साथ उत्पादन तकनीकों पर चर्चा की इच्छा जताई है, जबकि अन्य रिपोर्टों में स्थानीय निर्माण और संवेदनशील तकनीकों तक पहुंच से जुड़े प्रस्तावों का जिक्र हुआ है।

भारत को इस बात पर जोर देना चाहिए कि कोई भी तकनीक हस्तांतरण समझौता वास्तविक अर्थ रखे। भारत में आयातित पुर्जों की केवल असेंबली तकनीकी आत्मनिर्भरता नहीं कहलाएगी। देश को जहां तक संभव हो, निर्माण कौशल, रखरखाव क्षमता, अपग्रेड, सॉफ्टवेयर और अहम एयरोस्पेस तकनीकों तक पहुंच चाहिए। ऐसे सौदे का असली मूल्य केवल विमानों की संख्या में नहीं, बल्कि भारत के भीतर बनने वाली क्षमता में होगा।

यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत का स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft, यानी AMCA, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की जरूरत का दीर्घकालिक जवाब है। रिपोर्टों में कहा गया है कि AMCA कार्यक्रम के विकसित होने तक Su-57 एक स्टॉप-गैप विकल्प हो सकता है।

इसलिए विदेशी लड़ाकू विमान को AMCA का पूरक होना चाहिए, प्रतिस्पर्धी नहीं।

भारत पहले भी भारत-रूस Fifth Generation Fighter Aircraft कार्यक्रम के जरिए पांचवीं पीढ़ी का विमान विकसित करने की कठिनाइयां देख चुका है। लागत, तकनीक तक पहुंच और विमान की क्षमताओं से जुड़ी चिंताओं के बीच नई दिल्ली अंततः उस प्रयास से अलग हो गई थी। किसी भी नए समझौते को उस अनुभव से सीखना होगा।

लागत का सवाल भी उतना ही गंभीर है। लड़ाकू विमान की कीमत केवल खरीद मूल्य से नहीं आंकी जा सकती। भारत को इंजन, हथियार, स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे, अपग्रेड और दीर्घकालिक उपलब्धता सहित पूरे जीवन-चक्र की लागत जोड़नी होगी। अधिग्रहण के समय किफायती दिखने वाला विमान दशकों के संचालन में महंगा साबित हो सकता है।

आपूर्ति-श्रृंखला की सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रूस भारत का बड़ा रक्षा साझेदार बना हुआ है, लेकिन भू-राजनीतिक माहौल काफी बदल चुका है। मॉस्को पर पश्चिमी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय रक्षा आपूर्ति-श्रृंखलाओं में व्यवधान ने किसी एक बाहरी स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम दिखा दिए हैं। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य का लड़ाकू बेड़ा अपने पूरे परिचालन जीवन में भरोसेमंद तरीके से समर्थित रह सके।

फिर भी रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ रूसी रक्षा सहयोग से दूरी बनाना नहीं है। भारत और रूस के बीच सैन्य तथा तकनीकी सहयोग का लंबा इतिहास है, जिसमें BrahMos कार्यक्रम भी शामिल है। दोनों देश मौजूदा प्रणालियों के संभावित अपग्रेड और आगे के रक्षा सहयोग पर भी चर्चा कर रहे हैं।

इसलिए सही रास्ता न तो बिना शर्त स्वीकार करना है और न ही स्वतः अस्वीकार करना।

भारत को Su-57 प्रस्ताव का उपयोग मजबूत स्थिति से बातचीत के लिए करना चाहिए। यदि रूस सचमुच गहरे तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय निर्माण और सार्थक औद्योगिक सहयोग की पेशकश करने को तैयार है, तो नई दिल्ली को प्रस्ताव को गंभीरता से परखना चाहिए। लेकिन हर वादे को कानूनी रूप से लागू शर्तों, मापने योग्य पड़ावों और तकनीक तक सत्यापनीय पहुंच में बदलना होगा।

मौजूदा भारत-रूस संबंध रक्षा से कहीं आगे जाते हैं। पुतिन की यात्रा ऐसे समय हुई है, जब दोनों देश व्यापार, ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, विनिर्माण और अन्य क्षेत्रों में सहयोग गहरा करना चाहते हैं। यह व्यापक रिश्ता भारत को ऐसा रक्षा समझौता करने की गुंजाइश देता है, जो केवल एक और हथियार प्रणाली आयात करने के बजाय औद्योगिक और तकनीकी मूल्य दे।

सरकार के लिए पारदर्शिता भी जरूरी होगी। यदि बातचीत आगे बढ़ती है, तो सार्वजनिक विमर्श लागत, समयसीमा, तकनीक हस्तांतरण और परिचालन जरूरतों की विश्वसनीय जानकारी पर आधारित होना चाहिए। रक्षा खरीद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी होती है, इसलिए हर विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, लेकिन व्यापक रणनीतिक तर्क साफ समझाया जाना चाहिए।

भारत स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी की तकनीक का अनिश्चित इंतजार करते हुए क्षमता-रिक्ति का जोखिम नहीं उठा सकता। साथ ही, तत्काल जरूरत को घरेलू एयरोस्पेस विकास टालने का बहाना भी नहीं बनने दिया जा सकता।

इसलिए Su-57 पर फैसला एक सिद्धांत से निर्देशित होना चाहिए: भारत को क्षमता खरीदते हुए स्वतंत्रता बनानी है।

यदि रूसी प्रस्ताव भारत की वायु-शक्ति को तत्काल बढ़त, वास्तविक तकनीक हस्तांतरण, घरेलू विनिर्माण अनुभव और व्यापक एयरोस्पेस तंत्र के लिए उपयोगी तकनीकी आधार दे सकता है, तो उस पर गंभीर विचार होना चाहिए। यदि यह केवल आयातित प्रणालियों पर एक और दीर्घकालिक निर्भरता पैदा करता है, तो भारत को पीछे हटने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अंतिम लक्ष्य पांचवीं पीढ़ी के विमानों की अधिकतम संख्या जुटाना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य ऐसी भारतीय वायुसेना बनाना होना चाहिए, जो उन्नत युद्ध प्रणालियों को बढ़ती स्वतंत्रता के साथ डिजाइन, निर्माण, संचालित, रखरखाव और अपग्रेड कर सके।

Su-57 उस यात्रा का हिस्सा बन सकता है, लेकिन उसका विकल्प कभी नहीं।

भारत के लिए वास्तविक चुनाव केवल Su-57 और किसी दूसरे लड़ाकू विमान के बीच नहीं है। चुनाव यह है कि वह उन्नत वायु-शक्ति का खरीदार बना रहे या उसका निर्माता बने। आज लिया गया फैसला वर्तमान की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करे, लेकिन कल की तकनीकी आकांक्षाओं से समझौता न करे।


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