सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बातचीत के बीच पांचवीं पीढ़ी के एसयू-57 लड़ाकू विमान का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। रूस भारत को एसयू-57 की पेशकश के साथ तकनीकी हस्तांतरण, संयुक्त उत्पादन और स्थानीय विनिर्माण जैसे विकल्पों का संकेत दे रहा है। ऐसे समय में जब भारतीय वायुसेना के सामने लड़ाकू विमानों की संख्या और आधुनिक तकनीक की चुनौती है तथा स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम भविष्य की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, एसयू-57 पर भारत का फैसला केवल एक विमान खरीदने का फैसला नहीं होगा। यह भारत की दीर्घकालिक रक्षा रणनीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और सामरिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।

1. एसयू-57 केवल लड़ाकू विमान नहीं, रणनीतिक विकल्प है

पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान आधुनिक युद्ध में केवल तेज गति या अधिक हथियार ले जाने की क्षमता तक सीमित नहीं होते। उनकी वास्तविक ताकत स्टील्थ, उन्नत रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, सेंसर, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता और हथियार प्रणालियों के एकीकरण में होती है। इसलिए भारत को एसयू-57 पर विचार करते समय यह देखना होगा कि विमान भारतीय सैन्य ढांचे और भविष्य की युद्ध आवश्यकताओं में कितना प्रभावी ढंग से फिट बैठता है।

2. तत्काल जरूरत और भविष्य की तैयारी में संतुलन जरूरी

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वर्तमान सैन्य जरूरतों और भविष्य की स्वदेशी क्षमता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। रूस एसयू-57 को उस अंतरिम अवधि के समाधान के रूप में पेश कर रहा है, जब तक स्वदेशी एएमसीए पूरी तरह विकसित होकर भारतीय वायुसेना में शामिल नहीं होता। लेकिन अंतरिम समाधान ऐसा नहीं होना चाहिए जो भविष्य के स्वदेशी कार्यक्रम की गति या संसाधनों को प्रभावित करे।

3. तकनीकी हस्तांतरण सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा

यदि एसयू-57 पर कोई समझौता होता है तो उसकी सबसे बड़ी कसौटी वास्तविक तकनीकी हस्तांतरण होना चाहिए। केवल तैयार विमान भारत में जोड़ना या सीमित हिस्सों का उत्पादन करना आत्मनिर्भरता नहीं कहलाएगा। रूस की ओर से तकनीकी हस्तांतरण, संयुक्त विकास, स्थानीय उत्पादन और कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमताओं तक पहुंच की पेशकश की खबरें सामने आई हैं। भारत को इन प्रस्तावों को ठोस, कानूनी और मापने योग्य शर्तों में बदलना होगा।

4. एएमसीए की कीमत पर कोई समझौता नहीं

भारत का वास्तविक दीर्घकालिक लक्ष्य अपनी पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू विमान क्षमता विकसित करना होना चाहिए। एएमसीए इसी दिशा में महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। इसलिए एसयू-57 को यदि कभी अंतरिम विकल्प माना भी जाए तो उसे एएमसीए का विकल्प नहीं, बल्कि सीमित अवधि के लिए क्षमता-अंतर को भरने वाला साधन समझना होगा। किसी भी विदेशी खरीद के कारण स्वदेशी अनुसंधान, डिजाइन और उत्पादन क्षमता कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।

5. पुराने एफजीएफए अनुभव से सीख जरूरी

भारत और रूस पहले भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान के लिए एफजीएफए कार्यक्रम पर लंबे समय तक काम कर चुके हैं। बाद में यह कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका। इस अनुभव ने तकनीक, लागत, डिजाइन नियंत्रण और वास्तविक तकनीकी साझेदारी से जुड़े सवालों को सामने रखा था। इसलिए इस बार किसी भी प्रस्ताव पर निर्णय लेते समय पुराने अनुभव को नजरअंदाज करना रणनीतिक भूल होगी।

6. विमान की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण जीवनचक्र लागत

किसी लड़ाकू विमान की वास्तविक कीमत केवल खरीद मूल्य से तय नहीं होती। प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स, इंजन, हथियार, सॉफ्टवेयर अपडेट, आधारभूत ढांचा और लंबे समय तक संचालन की लागत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। भारत को एसयू-57 की पूरी जीवनचक्र लागत का मूल्यांकन करना चाहिए। सस्ता प्रारंभिक सौदा यदि भविष्य में महंगे रखरखाव में बदल जाता है तो वह आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं होगा।

7. प्रतिबंधों और आपूर्ति श्रृंखला का जोखिम

रूस के साथ रक्षा संबंध भारत के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का असर भी वास्तविकता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में विमान के महत्वपूर्ण कलपुर्जों, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों या तकनीकी सहायता की आपूर्ति प्रभावित न हो। किसी भी नए रक्षा सौदे में वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था और दीर्घकालिक रखरखाव की स्पष्ट योजना जरूरी है।

8. भारत-रूस संबंध केवल हथियारों तक सीमित नहीं

भारत और रूस के संबंध रक्षा से कहीं व्यापक हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, परमाणु सहयोग, उद्योग, विमानन और अन्य क्षेत्रों में सहयोग जारी है। मोदी-पुतिन वार्ता में रक्षा के साथ व्यापार, ऊर्जा, विनिर्माण, परमाणु ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे विषय भी चर्चा में हैं। इसलिए एसयू-57 पर फैसला व्यापक भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में लिया जाना चाहिए, लेकिन केवल राजनीतिक संबंधों के आधार पर रक्षा खरीद नहीं होनी चाहिए।

9. आधुनिक युद्ध में अकेला विमान निर्णायक नहीं

आज की लड़ाई केवल लड़ाकू विमान बनाम लड़ाकू विमान नहीं है। ड्रोन, उपग्रह, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लंबी दूरी की मिसाइलें, वायु रक्षा प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सुरक्षित संचार नेटवर्क आधुनिक युद्ध की पूरी तस्वीर बदल रहे हैं। इसलिए भारत को यह देखना होगा कि एसयू-57 इन सभी प्रणालियों के साथ कितनी अच्छी तरह एकीकृत हो सकता है।

10. मेक इन इंडिया का वास्तविक अर्थ

भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यदि एसयू-57 का विकल्प चुना जाता है तो स्थानीय उत्पादन, भारतीय कंपनियों की भागीदारी, कौशल विकास और देश में महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमता के निर्माण को समझौते का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। हाल के भारत-रूस सहयोग में विमान निर्माण और स्थानीय उत्पादन पर बातचीत भी इसी दिशा की ओर संकेत करती है।

11. रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ विकल्प खुले रखना

भारत की विदेश और रक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण आधार रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। रूस के साथ रक्षा सहयोग इसका एक हिस्सा है, लेकिन भारत को अमेरिका, फ्रांस, इजरायल और अन्य साझेदारों के साथ भी तकनीकी और रक्षा सहयोग जारी रखना होगा। किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है।

12. फैसला भावनाओं से नहीं, सैन्य जरूरत से हो

भारत को एसयू-57 को केवल रूस के साथ दोस्ती के प्रतीक के रूप में नहीं देखना चाहिए और न ही केवल भू-राजनीतिक दबाव के कारण इसे खारिज करना चाहिए। निर्णय का आधार भारतीय वायुसेना की वास्तविक परिचालन जरूरत, विमान की क्षमता, लागत, तकनीकी हस्तांतरण, रखरखाव और भविष्य की स्वदेशी योजनाएं होनी चाहिए।

निष्कर्ष

एसयू-57 पर भारत के सामने असली सवाल यह नहीं है कि रूस का विमान अच्छा है या खराब। असली सवाल यह है कि क्या यह भारत की वर्तमान रक्षा जरूरत और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बीच उपयोगी पुल बन सकता है। यदि प्रस्ताव में वास्तविक तकनीकी हस्तांतरण, भारत में उत्पादन, दीर्घकालिक रखरखाव क्षमता और स्वदेशी उद्योग को मजबूत करने की ठोस व्यवस्था है, तो इस पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।

लेकिन यदि सौदा केवल तैयार विमानों की खरीद तक सीमित रहता है और भारत की अपनी पांचवीं पीढ़ी की क्षमता को कमजोर करता है, तो इससे बचना अधिक समझदारी होगी। भारत को विमान नहीं, क्षमता खरीदनी चाहिए; तकनीक लेनी चाहिए, केवल प्लेटफॉर्म नहीं; और तत्काल जरूरत पूरी करते हुए भविष्य की आत्मनिर्भरता को सुरक्षित रखना चाहिए। यही एसयू-57 पर भारत की सबसे संतुलित और रणनीतिक नीति हो सकती है।


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