सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ दिल्ली : ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी से ठीक पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने यह सवाल उठाया है कि हाल की ब्रिक्स बैठकों से भारत को आखिर कितने ठोस और प्रत्यक्ष लाभ मिले हैं। उनका कहना है कि पिछले दो-तीन सम्मेलनों से उन्हें कोई महत्वपूर्ण परिणाम दिखाई नहीं दिया। इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए विदेश नीति को केवल लेन-देन के नजरिए से देखने पर सवाल उठाया है।
यह विवाद केवल सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तव में चिदंबरम का सवाल एक महत्वपूर्ण नीतिगत बहस की शुरुआत कर सकता है—आखिर किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन में भारत की सदस्यता और सक्रिय भागीदारी का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाए? क्या केवल तत्काल आर्थिक लाभ को सफलता का पैमाना माना जाए या रणनीतिक, कूटनीतिक और दीर्घकालिक लाभों को भी इसमें शामिल किया जाए?
1. ब्रिक्स का महत्व केवल आर्थिक नहीं
ब्रिक्स आज केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है। इसका विस्तार हुआ है और इसमें एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया तथा अन्य क्षेत्रों की महत्वपूर्ण उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत के लिए यह मंच वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ संवाद बढ़ाने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवाज को मजबूत करने का अवसर देता है।
इसलिए ब्रिक्स को केवल व्यापारिक सौदों की सूची से मापना उचित नहीं होगा। कूटनीतिक संवाद, संकट के समय संपर्क, रणनीतिक सहयोग और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रभाव भी इसके महत्वपूर्ण परिणाम हो सकते हैं।
2. लेकिन ठोस परिणामों का सवाल भी जरूरी
विदेश नीति में दीर्घकालिक लाभ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार से परिणामों के बारे में सवाल ही न पूछे जाएं। यदि भारत किसी बहुपक्षीय मंच में सक्रिय भूमिका निभा रहा है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उससे देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों को क्या फायदा हुआ।
ब्रिक्स से भारतीय निर्यातकों को कितने नए बाजार मिले? कितना निवेश आया? तकनीकी सहयोग कितना बढ़ा? ऊर्जा सुरक्षा में क्या सुधार हुआ? सीमा-पार भुगतान को कितना आसान बनाया जा सका? ऐसे प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर आवश्यक हैं।
3. दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए बड़ा अवसर
भारत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। इस वर्ष भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन में वैश्विक शासन, व्यापार, निवेश, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक तथा अंतरराष्ट्रीय संघर्ष जैसे विषयों पर चर्चा अपेक्षित है।
इसलिए यह सम्मेलन केवल मेजबानी का अवसर नहीं है। यह भारत के लिए यह दिखाने का मौका भी है कि वह ब्रिक्स को व्यावहारिक परिणाम देने वाले मंच के रूप में किस दिशा में ले जाना चाहता है।
4. ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी मंच बनाना भारत के हित में नहीं
भारत की विदेश नीति की एक बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता रही है। भारत अमेरिका और यूरोप के साथ अपने संबंध मजबूत करता है, वहीं रूस, चीन, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ भी अपने हितों के अनुरूप संबंध बनाए रखता है।
इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी राजनीतिक गठबंधन में बदलना उचित नहीं होगा। भारत का हित इस बात में है कि ब्रिक्स आर्थिक और विकास सहयोग का मजबूत मंच बने, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखे।
5. चीन के साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों
ब्रिक्स में चीन की भूमिका बड़ी है और भारत-चीन संबंधों में प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग की संभावनाएं भी मौजूद हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह ब्रिक्स के भीतर चीन के साथ संवाद बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।
विशेष रूप से व्यापार असंतुलन, तकनीकी सुरक्षा और वित्तीय प्रणालियों के मामले में भारत को सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा।
6. डिजिटल भुगतान में भारत की पहल महत्वपूर्ण
भारत ब्रिक्स देशों के बीच केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्राओं और डिजिटल भुगतान प्रणालियों को जोड़ने की दिशा में पहल कर रहा है। इसका उद्देश्य सीमा-पार भुगतान को अधिक तेज और आसान बनाना है। यदि यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप लेती है तो व्यापार और धन हस्तांतरण की लागत कम हो सकती है।
लेकिन इसके सामने तकनीकी, वित्तीय और राजनीतिक बाधाएं भी हैं। इसलिए इस पहल को केवल घोषणा तक सीमित रखने के बजाय चरणबद्ध और सुरक्षित तरीके से लागू करने की जरूरत होगी।
7. भारतीय निर्यातकों को वास्तविक लाभ मिलना चाहिए
ब्रिक्स का विस्तार भारत के कारोबार के लिए बड़े बाजार खोल सकता है। लेकिन केवल सदस्य देशों की संख्या बढ़ने से भारतीय उद्योग को लाभ नहीं मिलेगा। वास्तविक सफलता तब होगी जब भारतीय कंपनियों के लिए बाजार तक पहुंच आसान हो, व्यापार बाधाएं घटें और निर्यात बढ़े।
निर्यात संगठनों ने भी ब्रिक्स से व्यापार, निवेश, तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला और भुगतान व्यवस्था में मापने योग्य परिणाम हासिल करने की जरूरत पर जोर दिया है।
8. ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान जरूरी
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऊर्जा सुरक्षा भारत की बड़ी प्राथमिकता है। ब्रिक्स में तेल और गैस उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों तरह के देश शामिल हैं।
भारत को इस मंच का इस्तेमाल दीर्घकालिक ऊर्जा सहयोग, स्थिर आपूर्ति और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर बातचीत के लिए करना चाहिए। यदि ब्रिक्स ऊर्जा क्षेत्र में व्यावहारिक सहयोग विकसित कर सके तो इसका सीधा लाभ सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिल सकता है।
9. निवेश और तकनीक को केंद्र में लाना होगा
ब्रिक्स का भविष्य केवल राजनीतिक घोषणाओं में नहीं, बल्कि निवेश और तकनीकी साझेदारी में भी है। भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित तकनीक, स्वास्थ्य, कृषि तकनीक, सेमीकंडक्टर, डिजिटल बुनियादी ढांचे और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।
ऐसे क्षेत्रों में साझेदारी रोजगार और आर्थिक विकास के लिए अधिक स्थायी लाभ दे सकती है।
10. विपक्ष के सवालों को राजनीतिक तंज में नहीं बदलना चाहिए
चिदंबरम का सवाल राजनीतिक संदर्भ में आया है, लेकिन उसे केवल राजनीतिक हमला मानकर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में विदेश नीति पर सरकार से जवाब मांगना विपक्ष का अधिकार है।
यदि सरकार मानती है कि ब्रिक्स से भारत को महत्वपूर्ण लाभ हुए हैं, तो उसे उन उपलब्धियों के आंकड़े जनता के सामने रखने चाहिए। इससे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्य आधारित बहस को बढ़ावा मिलेगा।
11. विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं
दूसरी ओर विपक्ष को भी केवल यह पूछने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि भारत को क्या मिला। उसे यह भी बताना चाहिए कि ब्रिक्स को लेकर उसकी वैकल्पिक रणनीति क्या है।
क्या भारत को इसमें अधिक सक्रिय होना चाहिए? क्या इसकी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए? क्या आर्थिक सहयोग पर अधिक जोर देना चाहिए? ऐसे सवालों के जवाब विपक्ष की आलोचना को अधिक गंभीर और रचनात्मक बनाएंगे।
12. राजनीतिक नारों से विदेश नीति का मूल्यांकन नहीं
‘नाराज फूफा’ और अन्य राजनीतिक तंज भले ही राजनीतिक विमर्श और सामाजिक माध्यमों पर चर्चा पैदा करें, लेकिन विदेश नीति की सफलता इन नारों से तय नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पी. चिदंबरम के बीच राजनीतिक शब्दों का यह आदान-प्रदान अलग विषय है, लेकिन ब्रिक्स जैसी संस्था पर चर्चा को उससे आगे ले जाना जरूरी है।
भारत की विदेश नीति का मूल्यांकन व्यापार, निवेश, सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक और कूटनीतिक प्रभाव जैसे ठोस आधारों पर होना चाहिए।
13. ब्रिक्स की आंतरिक एकजुटता भी चुनौती
ब्रिक्स का विस्तार इसकी ताकत भी है और चुनौती भी। अलग-अलग देशों की राजनीतिक प्राथमिकताएं और रणनीतिक हित अलग हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने इन मतभेदों को और जटिल बनाया है। भारत को ऐसे वातावरण में समूह के भीतर सहमति बनाने की कठिन भूमिका निभानी होगी।
भारत के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि ब्रिक्स किसी एक देश के प्रभाव वाला मंच न बने और विभिन्न सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग जारी रहे।
14. सफलता का पैमाना स्पष्ट होना चाहिए
नई दिल्ली सम्मेलन के बाद यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत किन परिणामों को अपनी प्राथमिक उपलब्धि मानेगा। उदाहरण के लिए भारतीय निर्यात में वृद्धि, नए निवेश समझौते, डिजिटल भुगतान में प्रगति, ऊर्जा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार जैसे संकेतक तय किए जा सकते हैं।
इससे ब्रिक्स की उपयोगिता का मूल्यांकन राजनीतिक दावों के बजाय वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जा सकेगा।
निष्कर्ष
ब्रिक्स भारत के लिए न तो कोई जादुई समाधान है और न ही ऐसा मंच जिसे केवल इसलिए महत्वहीन मान लिया जाए कि उससे तत्काल कोई बड़ा समझौता दिखाई नहीं देता। इसकी वास्तविक उपयोगिता इस बात में है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए इस मंच से आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक लाभ कितना हासिल कर सकता है।
पी. चिदंबरम का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे परिणामों पर बहस शुरू होती है। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उपलब्धियों को तथ्यों और आंकड़ों के साथ सामने रखे। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आलोचना के साथ वैकल्पिक दिशा भी बताए।
ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता बड़े भाषणों या राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि उन ठोस परिणामों से तय होगी जो भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करें। यही वह कसौटी है जिस पर भारत की ब्रिक्स नीति को परखा जाना चाहिए।
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