सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क–आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस /आईटीडीसी न्यूज़ भोपाल : मुंबई: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) सांसद संजय राउत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर मराठा आरक्षण आंदोलन से जुड़े ₹500 करोड़ के कथित लेन-देन की प्रवर्तन निदेशालय (ED) और महाराष्ट्र पुलिस से जांच कराने की मांग की है। कार्यकर्ता मनोज जरांगे-पाटिल द्वारा एक ऑडियो क्लिप जारी किए जाने के बाद विवाद तेज हुआ, जिसमें कथित तौर पर आंदोलन को प्रभावित करने के लिए भुगतान पर चर्चा है।

राउत ने कथित रकम के स्रोत और गंतव्य पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पैसा किसने जुटाया, किसे मिलना था और उसका क्या हुआ। उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उनके बेटे, शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे की कथित भूमिकाओं की भी जांच कराने को कहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, जरांगे-पाटिल ने आरोप लगाया कि यह रकम 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले मराठा आरक्षण आंदोलन को कमजोर करने के लिए थी। कार्यकर्ता ने दावा किया कि कथित राशि श्रीकांत शिंदे के जरिए भेजी जानी थी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कोई पैसा नहीं मिला। एकनाथ शिंदे और श्रीकांत शिंदे, दोनों ने आरोपों को खारिज किया है।

विवाद के बीच ऑडियो रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठे हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने क्लिप की फॉरेंसिक जांच के आदेश दिए हैं, जबकि भाजपा नेताओं ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता और उससे जुड़े आरोप स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हुए हैं।

राउत ने केंद्र से निष्पक्ष और विस्तृत जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। उन्होंने पूछा कि क्या पिछले हाई-प्रोफाइल वित्तीय मामलों जैसी तत्परता इस मामले में भी दिखाई जाएगी। उनका कहना है कि सार्वजनिक चिंताओं को दूर करने और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने के लिए तथ्यों का सामने आना जरूरी है।

इस बीच, जरांगे-पाटिल ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है और विशेष जांच दल (SIT) के गठन की संभावना भी उठाई है। इस विवाद ने महाराष्ट्र में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज कर दिए हैं और सत्तारूढ़ गठबंधन पर सवाल बढ़े हैं, जबकि जांच एजेंसियों से रिकॉर्डिंग और संबंधित पक्षों के दावों की पड़ताल की उम्मीद है।

फिलहाल, कथित ₹500 करोड़ का लेन-देन एक आरोप है, किसी गलत काम का स्थापित निष्कर्ष नहीं। फॉरेंसिक जांच और उसके बाद संभावित जांच की दिशा से ही तथ्यों के निर्धारण में मदद मिलेगी।


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