सीएनएन सेंट्रल न्यूज़ एंड नेटवर्क्स / आईटीडीसी इंडिया ईप्रेस / आईटीडीसी न्यूज़ /एजेंसियाँ/ भोपाल: भारतीय ऋषियों ने अभ्युदय और नि:श्रेयस के सामंजस्य पर बल दिया है। जीवन में भौतिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक विकास भी आवश्यक है। मन पर नियंत्रण और धैर्य का अभ्यास जीवन प्रबंधन के लिए अनिवार्य है। भारतीय चिंतन के इन सूत्रों को आत्मसात कर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक दिशा दे सकता है। उक्त विचार मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त उमाशंकर पचौरी ने बुधवार को एमलबी कॉलेज में व्यक्त किये।
भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान एवं शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में ‘जीवन प्रबंधन और भारतीय चिंतन’ विषय पर उन्मुखीकरण व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में मध्य प्रदेश के सूचना आयुक्त उमाशंकर पचौरी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य वंदना श्रीवास्तव ने की। इस अवसर पर दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा एवं हमीदिया विश्वविद्यालय में भूगोल विषय की विभागाध्यक्ष प्रो. अल्पना त्रिवेदी भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीर शर्मा ने किया।

अपने व्याख्यान में उमाशंकर पचौरी ने भारतीय चिंतन परंपरा को जीवन प्रबंधन का आधार बताते हुए कहा कि ‘सत्, चित्, आनंद’ ही हमारा वास्तविक स्वरूप है। भारतीय ऋषियों ने मानव मन, जीवन और उसके समग्र विकास पर गहन चिंतन किया है। उन्होंने कहा कि व्याख्यान कोई साधारण घटना नहीं होती। एक सार्थक वाक्य के पीछे भी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन और वर्षों की साधना होती है। भारतीय ज्ञान परंपरा में ऋषि किसी एक विषय पर अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर समाज को ज्ञान प्रदान करते थे।
उन्होंने जीवन प्रबंधन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय चिंतन में मन को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। मन दुनिया का सबसे बुरा स्वामी भी है और सबसे अच्छा सेवक भी। जब मन व्यक्ति को गलत दिशा में ले जाता है, तब वह उसके पतन का कारण बनता है, लेकिन जब मन को सही दिशा में लगाया जाता है, तो शत-प्रतिशत परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। जीवन प्रबंधन की दृष्टि से असफल व्यक्ति मनमुखी और सफल व्यक्ति गुरुमुखी होता है। इसलिए मनमुखी से गुरुमुखी बनना जीवन प्रबंधन का पहला सूत्र है।
पचौरी ने गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए माता पार्वती की तपस्या और महर्षि नारद के मार्गदर्शन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि माता पार्वती ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए घोर तपस्या की और भगवान शंकर को प्राप्त किया। इसी प्रकार भगवान राम ने भी महर्षि वशिष्ठ के चरणों में अपना मन समर्पित किया था। गुरु के वचनों पर विश्वास और उनके प्रति समर्पण के बिना सुख एवं सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण भारतीय जीवन दृष्टि का महत्वपूर्ण आधार है।

पचौरी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में आचार्यों की भूमिका का उल्लेख करते हुए नामकरण संस्कार का उदाहरण दिया। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ के संदर्भ में बताया कि शास्त्रों में वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर पर हजार वर्षों की साधना का उल्लेख मिलता है। ‘रा’ अक्षर तक पहुंचने पर प्रकाश उत्पन्न हुआ और इसी साधना के क्रम में राम नाम की सार्थकता सामने आई। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि भारतीय परंपरा में ज्ञान और संस्कार के पीछे दीर्घकालीन साधना एवं चिंतन की भूमिका रही है।
उन्होंने हिंदी गिनती के माध्यम से भी जीवन प्रबंधन के सूत्र समझाए। उनके अनुसार ‘रह’ का भाव झुकना और रुकना सिखाता है। माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान तथा प्रत्येक व्यक्ति में देवत्व का दर्शन करने की भावना भारतीय चिंतन का हिस्सा है। उन्होंने ‘विद्या ददाति विनयम्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में विनम्रता, धैर्य और सुनने की क्षमता का विशेष महत्व है। भारतीय चिंतन में 50 वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ का समय माना गया है। उन्होंने कहा कि मन बहुत दूर तक यात्रा करता है, जहां तक शरीर नहीं पहुंच सकता। इसलिए मन को धैर्य और अनुशासन सीखाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में प्रत्येक बच्चा एक स्वतंत्र इकाई है। किसी एक पाठ्यक्रम अथवा प्रणाली में सभी बच्चों को बांधना उचित नहीं है, क्योंकि दो बच्चों पर एक ही प्रणाली लागू नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन को गढ़ना और उसकी दरिद्रता को दूर करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि माता-पिता और गुरु को देवतुल्य मानकर उनके संस्कारों से अपना जीवन गढ़ना चाहिए।
इस अवसर पर प्राचार्या प्रो. वंदना श्रीवास्तव ने कहा कि हमारे बुजुर्गों का जीवन ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सिद्धांत पर आधारित था। जीवन आसान नहीं होता, बल्कि उसे बेहतर बनाना पड़ता है। इसके लिए दीर्घकालीन जीवन प्रबंधन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को जीवन प्रबंधन की आवश्यकता है। भारतीय परंपरा में घरेलू साधनों से चिकित्सा और मेडिसिनल प्लांट्स के उपयोग की समृद्ध परंपरा रही है, जिसे अपनाने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। अंत में राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी भावना ठाकुर ने आभार व्यक्त किया।
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